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Showing posts from 2015

घर क्या बंटा, बेटी अनजान बन गई। मुल्क क्या बंटा, उर्दू मुसलमान हो गई।

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बचपन से ही मेरी ख्वाहिश थी कि मैं एक ग्लोब खरीदूं लेकिन कभी खरीद नहीं पाया। इसकी वजह है मेरे गांव और उसके नजदीकी कस्बे की दुकानों में मुझे कहीं ग्लोब नहीं मिला। इसलिए मैंने दुनिया का नक्शा खरीद लिया और जब भी वक्त मिलता है इसे गौर से देखता हूं।

अगर बात नक्शे की करूं तो मैं पूरी दुनिया घूम चुका हूं लेकिन असल दुनिया में कभी दिल्ली जाने का भी मौका नहीं मिला। जब मैं नक्शे में किसी देश को देखता हूं तो उसका इतिहास और वहां की मुख्य भाषा का नाम मेरे दिलो-दिमाग पर छा जाता है।

जब मैं चीन को देखता हूं तो वहां की विशाल दीवार, ध्यान लगाते भिक्षु और तरक्की की बुलंदियां छूता एक प्राचीन देश पाता हूं। यहां की भाषा चीनी लोगों के स्वाभिमान को अभिव्यक्त करती है। दुनिया चाहे इसे कठिन मानती रहे लेकिन चीन इसी भाषा के दम पर लगातार आगे बढ़ रहा है।

भारत में संस्कृत ऐसी भाषा है जिसे मैं बहुत वैज्ञानिक तरीके से बनी हुई मानता हूं। हर अक्षर बहुत तार्किक और वैज्ञानिक ढंग से बना है। इसके लिए हमें प्राचीन त्रषियों का आभारी होना चाहिए। हिंदी को मैं खुले दिल की भाषा मानता हूं जिसने हर भाषा और संस्कृति का स्वागत किया है…

रब सब सुन रहा था, अगर मैं कुछ और मांग लेता तो मिल जाता

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कल शाम को घर जाते वक्त बस में बहुत भीड़ थी। मैं एक कोने में दुबका खड़ा था। साथ में किताबों का भारी थैला। इसलिए खड़े-खड़े पैरों में दर्द होने लगा।

मैंने मन में दुआ की ताकि यह दिक्कत दूर हो।

मैंने देखा, तुरंत मेरे लिए एक सीट खाली हो गई। मैं खुशी-खुशी उस पर बैठ गया।

तभी खयाल आया, इस वक्त रब ने मेरी दुआ कबूल कर ली। अगर मैं दुआ में सीट के बजाय कुछ और मांग लेता तो वह भी कबूल हो जाती।

- राजीव शर्मा, कोलसिया-

(मेरी डायरी से-25 दिसंबर 2011)

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वे सीमा पर जागते हैं तभी हम घरों में सुकून से सोते हैं

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अभी सर्दी की महज शुरुआत है और आज सुबह जब मैं ये अक्षर टाइप कर रहा हूं तो अंगुलियां कांप रही हैं।

ऐसे में हमारे बहादुर सैनिक सीमा पर मुस्तैदी से अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं, बिना शिकवा-शिकायत किए।

वे सीमा पर जागते हैं तभी हम घरों में सुकून से सो पाते हैं। उनके कष्ट का तो अंदाजा लगाना भी बहुत मुश्किल है। जो लोग बात-बात पर हड़ताल के झंडे उठा लेते हैं वे इस तस्वीर को जरा गौर से देखें।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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क्या स्वामी विवेकानंद जी को अपने अंतिम दिन का आभास था?

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क्या स्वामी विवेकानंद जी को अपने अंतिम दिन का आभास था? स्वामी जी ने 4 जुलाई 1902 को महासमाधि ली थी। उनका यह पत्र वर्ष 1900 में लिखा हुआ है यानी करीब 2 साल पहले। इसमें उन्होंने भगिनि निवेदिता को संकेत दिया है कि अब वे सिर्फ आराम करेंगे और शांत रहेंगे।

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युवाआें के नाम स्वामी विवेकानंद का पत्र

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अगर किताबें पढ़ने में आपकी रुचि है तो स्वामी विवेकानंदजी की एक किताब जरूर पढ़िए। इसका नाम है- अग्निमंत्र। इसमें स्वामीजी के कुछ एेतिहासिक पत्रों का संकलन किया है गया है जाे बहुत ही प्रेरणादायक हैं।

अग्निमंत्र मुझे बहुत अच्छी लगी। मैंने कर्इ बार इसे पढ़ा है आैर जब भी समय मिलता है, इस किताब को पढ़ता हूं। आज इसी किताब से आपके लिए स्वामीजी का एक पत्र प्रस्तुत कर रहा हूं।

यह पत्र उन्होंने 1893 में लिखा था। उस समय वे विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका जा रहे थे। वे भारत से जहाज में सवार हुए और जापान होते हुए अमेरिका गए।

पत्र से आप जान सकेंगे कि उस दौर की दुनिया कैसी थी, स्वामी ने क्या देखा और भारत के युवाओं के लिए उनका क्या संदेश था। पढ़िए स्वामीजी का यह पत्र...

ओरिएंटल होटल, याकोहामा,

10 जुलाई, 1893

प्रिय आलासिंगा, बालाजी, जि. जि. तथा मेरे मद्रासी मित्रगण,

अपने कार्यकलाप की सूचना तुम लोगों को बराबर न देते रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। यात्रा में जीवन बहुत व्यस्त रहता है और विशेषत: मुझे तो बहुत-सा सामान-असबाब साथ में लिये-लिये घूमने की आदत नहीं थी।

इन सब वस्तुओं की देखभाल में ह…

पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने कहा था कि जिस देश में रहो, उससे मुहब्बत करो

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हमने दुनिया का नक्शा बनते और बिगड़ते देखा है। ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब हिंदुस्तान के सीने पर भी परदेसी फौज के घोड़ों की टापें सुनार्इ देती थीं। हमने उन लोगों के किस्से भी किताबों में पढ़े हैं जिनकी तलवारें सिर्फ बेकसूर लोगों के खून से प्यास बुझाती थीं।

मैं इतिहास में सबकुछ जानने का दावा नहीं कर सकता लेकिन जितना जान सका हूं उसके आधार पर मुझे अतीत में दो महान घटनाएं ऐसी नजर आती हैं जब विजेता ने लाशों पर फतह नहीं पार्इ, अपनी जीत का जश्न नहीं मनाया और किसी कमजोर का गला नहीं दबाया। बल्कि युद्ध जीतकर भी उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया।

पहली घटना है- श्रीराम की लंका पर विजय। उस लंका पर जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सोने से बनी थी। तब श्रीराम के पास विशाल सेना थी, बहादुर साथी थे और हथियारों की भी कोर्इ कमी नहीं थी लेकिन उन्होंने जीती हुर्इ लंका विभीषण को सौंप दी।

वे चाहते तो लंका के राजा बन सकते थे। वहां आराम की जिंदगी गुजार सकते थे लेकिन उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि मुझे मां के कदमों की मिट्टी और मेरी मातृभूमि स्वर्ग से भी ज्यादा प्रिय हैं।

दूसरी घटना है पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) के जीव…

मंदिर का फूल और मस्जिद का पानी किसी में कभी फर्क नहीं करते

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जैसा मैंने देखा, जैसा मैंने समझाः

किसी एक धर्म के प्रति कट्टरता, किसी एक देश या जाति के लोगों को ही सबसे अच्छा या सबसे बुरा समझना सबसे बड़ी मूर्खता है। जहां कहीं जो अच्छाई है, उसकी कद्र करनी चाहिए।

सूली पर चढ़े यीशु और पत्थरों की मार से घायल हुए मुहम्मद साहब (सल्ल.) के खून का रंग उस वक्त भी वैसा ही था, जैसा आज आपके खून का रंग है।

मंदिर का फूल और मस्जिद का पानी किसी में कभी फर्क नहीं करते। एक बिना मजहब पूछे खुशबू फैलाता है, दूसरा वुजू के साथ हर इन्सान और परिंदे की प्यास बुझाता है।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

(From My Old Diary-- January 2011)
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आखिरी हज में पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने पूरी दुनिया के नाम दिया था यह पैगाम

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पैगंबर मुहम्मद साहब अल्लाह के जिस संदेश और इंसानों के लिए अच्छाई की सौगात लेकर आए उसमें उन्हें कामयाबी हासिल हुई।

यूं तो उनका संपूर्ण जीवन ही नेकी, भलाई, अमन और सच्चाई की मिसाल है, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी हज में जो बातें कहीं वे हर इंसान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

यह तब की बात है जब हिजरत का दसवां साल था। प्यारे नबी (सल्ल.) हज के लिए मक्का रवाना हुए। आपके साथ एक लाख से ज्यादा बहादुर साथियों का काफिला था।

इतिहास में इस हज को हिज्जतुल-वदा कहते हैं। यह आपका आखिरी हज था। इस हज को हिज्जतुल-बलाग़ भी कहा जाता है, क्योंकि अल्लाह का जो संदेश आप पहुंचाने आए थे, वह पूरा हो गया था।

इस अवसर पर आपने (सल्ल.) लोगों के सामने एक तकरीर भी की। आपने फरमाया-

प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कहूं, ध्यान से सुनो, क्योंकि हो सकता है कि इस साल के बाद मैं आपसे यहां न मिल सकूं।

याद रखो, मेरी बातों पर अमल करोगे तो फलत-फूलते रहोगे। इसके बाद आपने जिंदगी से जुड़ी कई पवित्र बातें कहीं। उनका सार इस प्रकार है-

अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत मजबूती से पकड़े रहना। लोगों की जान-माल और इज्जत का ख्याल रखना। कोई अ…

मैंने मुहब्बत तुमसे की है तो मौत से डरना कैसा

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जब से मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया है, मेरे कई दोस्त बन गए हैं। उनके साथ मेरा जुड़ाव सिर्फ इंटरनेट के जरिए है। मैंने उन्हें अब तक देखा नहीं, फिर भी उनसे दोस्ती का एक भावनापूर्ण रिश्ता बन गया है।

कुछ दिनों पहले मेरा ब्लाॅग पढ़ने के बाद मास्को में रहने वाले एक दोस्त को भरोसा हो गया कि मैं नास्तिक हो सकता हूं। यह उनका एक अनुमान था आैर जब मैंने उन्हें हकीकत बताई तो यह गलत निकला।

इस बात पर वे बेहद निराश भी हैं। उनका मानना है कि दुनिया में रहस्यों की संख्या बहुत ज्यादा है। जिस दिन दुनिया का आखिरी रहस्य सुलझा लिया जाएगा, उसी दिन हर गली-चौराहे पर नास्तिक लोगाें की संख्या ज्यादा दिखाई देगी।

उनके मुताबिक उस दिन का आगमन उतना ही निश्चित है जितना कि इस साल रूस में कड़क सर्दी पड़ना। मैं जानता हूं वह दिन इस धरती पर कभी नहीं आएगा जब दुनिया का आखिरी रहस्य सुलझा लिया जाएगा, लेकिन रहस्यों से जुड़ी उनकी विचारधारा जानने के बाद मैंने खुद से जुड़े रहस्यों पर गौर किया।

मैं मानता हूं कि हर शख्स की जिंदगी का एक भाग रहस्य के कोहरे में छुपा होता है। अक्सर ऐसे कई रहस्य हम भूल भी जाते हैं और जो याद रहते हैं उनका जिक्र…

पेरिस के लोगों, मुझे पूरी हमदर्दी है लेकिन मैं आपके समर्थन में अपनी Profile Pic का रंग नहीं बदलूंगा

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पेरिस हो या पंजाब, हमने धमाकों में सिर्फ बेगुनाह लोगों को मरते देखा है। बारूद का सौदा करने वाले कभी इस बात की परवाह नहीं किया करते कि इसके धमाके किसे बख्शेंगे आैर किसकी जान लेंगे, क्योंकि मौत के सौदागरों की जान सदा सलामत रहती है।

दो दशक पहले जब आतंकवादी गिरोह कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से निकाल रहे थे तब हिंदुस्तान बुलंद आवाज में दुनिया को बता रहा था कि इसे आतंकवाद कहते हैं ... लेकिन यूएन आैर अमरीका कहते कि यह तो दो देशों का छोटा-मोटा आपसी मसला है। इसलिए भारत को ज्यादा शोर नहीं मचाना चाहिए।

हमने 26/11 की कर्इ बरसियां मना लीं आैर हर बार दुनिया को बताते रहे कि इसे आतंकवाद कहते हैं लेकिन मुंबर्इ के वे धमाके इसकी गलियों में ही गुम हो गए, वे कभी यूरोप आैर अमरीका के कानों तक नहीं पहुंचे।

आज जो ISIS पेरिस तक पहुंच गया है, वह अमरीका की उसी नसीहत का नतीजा है जिसमें भारत को हर बार शांति बनाए रखने का संदेश मिलता आैर अातंकवाद फैलाने वाले देशों को अमरीकी डाॅलर।

मैं भी मानता हूं कि पेरिस के धमाके मानवता के विरुद्घ अपराध हैं आैर इसमें मरने वाले लोग बेकसूर हैं। जिन्हाेंने भी इस घटना को अंजाम दिया …

मेरा तुमसे कोर्इ रिश्ता नहीं, मगर मैं तुम्हें जिंदा देखने की दुआ मांगता हूं

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‘जमाना बड़ा खराब है’ - जमाने की शान में यह बात हम बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन यह अच्छा कब होगा, इसका पुख्ता जवाब शायद ही किसी के पास हो।

जमाना सौ फीसदी सही कब होगा, यह तो जमाना ही जाने, मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि अगर हम खुद की भूमिका पर गौर करें आैर उसमें सुधार कर लें तो भी जमाना बदल सकता है।

अक्सर ज़िंदगी के किसी मोड़ पर एक दौर ऐसा आता है जब हमें किसी की मदद की जरूरत होती है। साल 2005 की वह ठंडी रात आज भी मुझे याद है जब रात घर के बिस्तर पर गुजरी और अगला दिन ऑपरेशन थिएटर में।

दरअसल एक भयंकर दुर्घटना के बाद मुझे करीब एक महीना जयपुर के एसएमएस अस्पताल में बिताना पड़ा। उस दौरान ज़िंदगी की डोर कई बार कमजोर हुई, लेकिन किसी तरह यह टूटने से बची रही।

बीच में हालात कुछ ठीक हो जाने पर मैं घर चलने की जिद करने लगा। आखिरकार पिताजी मान गए और हमने दोपहर की ट्रेन से जाने का फैसला किया, क्योंकि उसमें भीड़ बहुत कम थी।

साथ ही सड़क पर लगने वाले झटकों से भी यह सुरक्षित थी। ट्रेन में मेरे सामने एक महिला बैठी थी। उसने मुझसे ज्यादा बात नहीं की, मगर हमारा सामान रखने में उसने बहुत मदद की।

अभी ट्रेन मुश्किल से एक घंट…

کاشی کے چندن میں مدینہ کی وہ خوشبو

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کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

وہ مٹھی بھر امیدیں
-وہ گہرے غم کے سائے

وہ چھتری دھوپ سنہری
-اور لمبی لمبی راہیں

لب پر نام ہو رب کا
-جب سفر ختم ہو جائے

تیری مٹی پاک مدینہ
-تیرا کن کن پاون کاشی

جنت کو میں کیا چاہوں
-بس نام تمہارا کہہ دوں

کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

محبت کے ہیں مرکز
-امن کا آشیانہ

گنگا تو ندی نہیں ہے
-تم سے رشتہ بہت پرانا

ہر ڈبکی میں تیری
-کائنات نظر جو آئے

میرے دل سے پوچھو تم بھی
-میری روح بسی ہے تجھ میں

میرے قدم چلیں نیکی پر
-ہمسایہ بن کر چل دوں

کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

ہو گئیں مرادیں پوری
-راہی کو ملا ٹھکانا

امیدیں جگیں نویلی
-عبادت کا ایک بہانہ

میرا ہر دن عید دیوالی

-ہر لمحہ خوشی لٹاو

مندر میں خدا ملے تو
-مسجد میں روز میں جاؤں

کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

دن بیتے شہر مدینہ
-اور سانجھ پڑی ہے کاشی

سچ ہو گیا خواب پرانا
-میرا دل خوش بھارت واسی

میری نظر جدھر بھی دی…

जब मुहम्मद साहब (सल्ल.) के इन्साफ से टल गया अरब की धरती से एक विनाश

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पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) एक एेसा नाम हैं जिनका असर सिर्फ अरब की धरती पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर हुअा। जिन लोगों ने सही नजरिए से उनके बारे में जानने की कोशिश की, उनके दिलों में पैगम्बर साहब (सल्ल.) का स्थान आैर भी ऊंचा हो गया लेकिन जिन्होंने किसी गलत जरिए या गलत नजरिए से उनके बारे में पढ़ा, सुना या समझा, उनके हाथ सिवाय नफरत के आैर कुछ नहीं लगा।

आज जिस इंटरनेट को हम ज्ञान का सबसे बड़ा आैर सहज माध्यम समझते हैं वहां अफवाहों का बाजार भी बहुत गर्म है। अगर आप लिखना जानते हैं तो एेसी बातें लिखिए जो लोगों में मुहब्बत आैर भार्इचारा पैदा करें।

इन्सान किससे बड़ा होता है? वह न तो किसी देवता का अश्लील चित्र बनाने से बड़ा होता है आैर न किसी पैगम्बर का कार्टून बनाने से। वह बड़ा होता है बड़े की बड़ार्इ करने से आैर उसकी खूबियों को अपनाने से। नफरत का जहर जितना जल्दी फैलता है वह उतनी ही तेजी से फैलाने वाले को खत्म भी करता है।

मेरी आज की यह पोस्ट पैगम्बर साहब (सल्ल.) के महान जीवन की एक घटना से जुड़ी है। मैं इस इरादे के साथ इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं कि नेक लोग हर देश आैर हर धर्म में पैदा हुए हैं।…

जब गुलाम बच्चे को पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने दी आजादी की सौगात

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गुलामी प्रथा का इतिहास बहुत पुराना है। दुनिया के अलग-अलग देशों में इसका जिक्र आता है। एक जमाना था जब लोग गुलाम रखते थे और उन्हें इस रिवाज में कोई बुराई नजर नहीं आती थी।

गुलाम भी इसे अपनी किस्मत का फैसला समझकर मंजूर कर लेते थे और इसी में उनकी जिंदगी खत्म हो जाती थी। कई देशों में लोग इसके समर्थन और विरोध में एकजुट हुए। वहां गृहयुद्ध तक हुए।

पैगंबर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने करीब डेढ़ हजार साल पहले ही कह दिया था कि ईश्वर के सामने सभी इंसान बराबर हैं। न किसी अरबी को गैर-अरबी पर प्राथमिकता है और न कोई गैर-अरबी किसी अरब वाले से बड़ा है।

उनके महान जीवन में ऐसी कई घटनाएं आती हैं जब उन्होंने गुलामों से न केवल बहुत अच्छा, बहुत नरमी का बर्ताव किया बल्कि उन्होंने गुलामों को आजाद तक कर दिया था। पढ़िए उनकी बेमिसाल जिंदगी की एक घटना जब उन्होंने एक गुलाम को आजाद कर दिया।

मुहम्मद साहब (सल्ल.) की पत्नी का नाम खदीजा (रजि.) था। खदीजा के एक भतीजे थे, नाम था- हुकैम-बिन-हिजाम। एक दिन खदीजा उनसे मिलने गईं तो एक गुलाम भी साथ ले आईं। वह एक लड़का था।

मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने उनसे पूछा- यह कैसा लड़का है खदीजा?

खदीजा (रज…
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सभी साथियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। आपके जीवन में प्रसन्नता, सफलता आैर प्रेम का प्रकाश हो। अनेक मंगल कामनाएं!!

- राजीव शर्मा -


क्या देखते हो लोगों, हर आंसू का हिसाब देना होगा

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क्या इन्सान को अपने गुनाह का बदला मिलता है? इस सवाल के बारे में अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि दुनिया में तो बुराई का ही बोलबाला है। अच्छे लोगों की कोर्इ नहीं सुनता और दुष्टों को लाख बुराई के बावजूद हमेशा तरक्की मिल जाती है।

हम लोग ऐसा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू बहुत कम लोग ही देख, सुन और समझ पाते हैं। अच्छाई एक दिन फल जरूर देती है, भले ही थोड़ा वक्त लग जाए। इसी तरह बुराई भी अपना असर जरूर दिखाती है। बस थोड़ा वक्त लग जाता है।

यह वक्त इसलिए लगता है क्योंकि परमात्मा या अल्लाह उस व्यक्ति को सुधरने के लिए थोड़ा समय देता है, लेकिन यकीन कीजिए भलाई और बुराई एक दिन जरूर अपना फल देती हैं।

मैं मेरी जिंदगी की एेसी कुछ घटनाआें का भी आगे जिक्र करूंगा जब मुझसे गलती हुर्इ आैर उसका विचित्र तरीके से फल भी मुझे मिला आैर बहुत जल्द मिला।

तब मैंने एेसा महसूस किया कि भलार्इ करने के बाद आप चाहें तो उसे भूल जाएं क्योंकि उसका नेक बदला मिलेगा आैर उससे हमें कोर्इ नुकसान नहीं है लेकिन बुरार्इ करने के बाद मुझे यह नहीं भूलना चाहिए कि हर लम्हा उसका बदला मेरी आेर बढ़ता जा…

तुम्हें कौनसी शक्ल दिखाऊं बापू, मेरे हाथ तो खून से रंगे हैं

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बापू के नाम यह खत मैंने 2 अक्टूबर 2013 को लिखा था। इसकी ज्यादातर बातें आज भी सच लगती हैं। खासतौर से खून से हाथ रंगे होने की। उस वक्त हमने मुजफ्फर नगर के दंगों में अपने हाथ रंगे थे आैर इस साल दादरी इलाक़े के बिसाहड़ा गांव में, जहां भीड़ ने सिर्फ अफवाह सुनकर अखलाक अहमद को मार डाला। इस बार मैं बापू को जन्मदिन की बधार्इ नहीं दूंगा क्योंकि हमारे हाथ खून से रंगे हैं।

प्यारे बापू,

सादर प्रणाम!

यह पत्र मैं तुम्हें धरती के उस हिस्से से लिख रहा हूं जिसकी आजादी के लिए तुमने पूरी जिंदगी दे दी थी। मुझे दुख है कि हम तुम्हें गोली के अलावा कुछ नहीं दे सके।

आगे समाचार यह है कि तुम्हारी गैर-मौजूदगी का हमने पूरा-पूरा फायदा उठाना सीख लिया है। जिस भारत की कहानी तुम अपने लहू की स्याही से लिख रहे थे, उसे हमने महाभारत बना दिया है।

हमने ताजा-ताजा खून से हाथ रंगे हैं। हमें आज हर इन्सान में ‘चोर’ दिखाई देता है, लेकिन हम खुद को सुधारने की कोई जरूरत नहीं समझते।

हक मांगने के मामले में हम बहुत जागरूक हो गए है और फर्ज की बातें हमें बिल्कुल पसंद नहीं। जिस राजनीति को तुम सेवा का सबसे बड़ा जरिया मानते थे, आज वह कुछ लोग…

सावधान रहें, क्योंकि कोर्इ आपकी कब्र पर चूल्हा जलाना चाहता है... होशियार रहें, कोर्इ आपकी चिता पर रोटी सेकना चाहता है

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इस कहानी को पढ़ने में जल्दबाजी न करें। यह भारत आैर अफगानिस्तान जैसे कुछ देशों पर आधारित है। इसमें मैंने यह बताने की कोशिश की है कि आज हम कुरआन आैर गीता के पैगाम को भूल गए हैं, इसलिए हमें अल्लाह या भगवान को दोषी ठहराने का कोर्इ हक नहीं है। दुनिया के बद से बदतर हालात के लिए इन्सान दोषी है आैर वह चाहे तो उन्हें बेहतर भी कर सकता है।

कुरआन आैर गीता में कहीं भी आतंकवाद का समर्थन नहीं किया गया है। ये दोनों किताबें शांति आैर भार्इचारे का संदेश देती हैं, लेकिन कुछ चालाक किस्म के लोग हमें बेवकूफ बनाते हैं आैर अपने खोटे मंसूबे पूरे करने के लिए इन पवित्र किताबें का हवाला देते हैं। हमें एेसे लोगों से बचना चाहिए। सावधान रहिए, क्योंकि कोर्इ आपकी कब्र पर चूल्हा जलाना चाहता है। होशियार रहिए, कोर्इ आपकी चिता पर रोटी सेंकना चाहता है। अब आप यह कहानी पढ़िए, मैं जाता हूं...

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- बेगुनाह का गोश्त -
यह मुल्क कौनसा है, मैं नहीं जानता। मेरा नाम भी मुझे मालूम नहीं। मेरा मजहब क्या है, यह मैं अब तक नहीं जान सका हूं। एक सवाल मैं खुद से बहुत बार पूछ चुका हूं कि यह साल…

ये अंधों का शहर है गुरुशरण, तुम चिराग बांटते क्यों मर गए?

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राजस्थान में पूर्णतः शराबबंदी की मांग को लेकर 32 दिनों से अनशन कर रहे पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा का देहांत हो गया। मुझे आश्चर्य होता है, इस जमाने में कोई शराबबंदी की मांग कैसे कर सकता है! यह तो आरक्षण, मंदिर-मस्जिद और गोश्त के नाम पर सियासत चमकाने का दौर है।

ऐसे में किसी ने शराबबंदी की मांग ही क्यों की? यकीनन ऐसे शख्स की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी और वह मेरे लिए, आपके लिए और सबके लिए भूख से मर गया।

मौत के बाद जहां परिजनों ने उनकी देह मेडिकल छात्रों के अध्ययन के लिए दान कर दी, वहीं यह मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई। सबसे बड़ा सवाल है- क्या भारत में कभी पूर्णतः शराबबंदी हो सकती है? इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन हकीकत यही है कि शराब ने कई घरों को उजाड़ा है, इसकी बोतल ने कई परिवार तबाह किए हैं।

मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिन्होंने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई शराब की दुकान में भेंट कर दी। उनके घर में चूल्हा भले ही न जले लेकिन बोतल का ढक्कन जरूर खुलता है। शराब को लेकर एक कहानी मैं भूला नहीं हूं जो मैंने कहीं पढ़ी थी। हो सकता है कि इसे पेश करने में कुछ कमी रह जाए। अगर रहे तो आप बताइए।

वह ब्रिटेन जिसकी मैं तारीफ करता हूं

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मुझे वह ब्रिटेन पसंद नहीं जिसने भारत पर शासन के दौरान मेरे देशवासियों पर जुल्म ढाए, लेकिन मैं उस ब्रिटेन की तारीफ करता हूं जिसने दुनिया को लोकतंत्र, मानवाधिकार, कर्तव्य अौर समानता का पाठ पढ़ाया। वहां लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं।

ब्रिटेन दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा नहीं कर सकता लेकिन वह एक अच्छे लोकतंत्र के प्रति भरोसा मजबूत कर सकता है।

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा तो रोज करते हैं लेकिन यह सबसे अच्छा आैर सबसे मजबूत लोकतंत्र कब होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

इस तस्वीर में हैं- ब्रिटेन के पीएम श्री डेविड कैमरून... जो सफर के दौरान एक कोने में खड़े हैं आैर अखबार पढ़ रहे हैं। भारत में तो हम राजनेताआें से एेसे दृश्य की सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -


नानक बाबा कै नाम मारवाड़ी मं मांडेड़ी म्हारी अेक बात..

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मेरे पुरखों ने शहादत से पहले नहीं कहा कि मौत के बाद जनाजा मंदिर के नजदीक न गुजरे

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देश में एक अजीब-सी और जहरीली किस्म की हवा घुल रही है। कुछ लोग कहते हैं कि तुम गाय को हाथ तो लगाओ, हम तुम्हें छठी का दूध याद दिला देंगे तो कुछ लोग छाती ठोक कर ऐलान करते हैं- क्या समझते हो, हम तुम्हें गौमांस खाकर दिखाएंगे।

ये किस किस्म के लोग हैं और इनके कैसे इरादे हैं? आज हिंदुस्तान में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब बेटियों की अस्मत नहीं लूटी जाती, ऐसा कोई लम्हा नहीं बीतता जब कोई जिंदगी वक्त से पहले दम नहीं तोड़ती, किसान बदहाल है, अफसरों ने लूट मचा रखी है, लेकिन इन मुद्दों पर बात करने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। ये किस तरह की बहस लेकर हम बैठ गए हैं और क्यों एक दूसरे को चुनौती दे रहे हैं?

ऐसे हालात देखकर मुझे याद आते हैं वे लोग जिन्होंने 1857 में हिंदुस्तान पर काबिज गोरी हुकूमत की नींव हिला दी थी। कुछ ऐसा ही जमाना था, ऐसी ही घुटन थी, ऐसी ही तकलीफें थीं और ऐसी ही लूट थी लेकिन जब कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी की बात फैली तो वह बात सिर्फ बात नहीं रही, चिन्गारी बनकर इन्कलाब में तब्दील हो गई।

क्या थे वे लोग और कैसे थे उनके इरादे! उनका इन्कलाब किसी हिंदू या मुसलमान के लिए नहीं था। जब गाय…

ब्रिटेन की संसद में की गर्इ ये भविष्यवाणी आज सच हो गर्इ

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हमारे देशवासियों ने भारत की आजादी के लिए कर्इ कुर्बानियां दीं। कुछ नाम मशहूर हुए तो कर्इ इस आजादी की नींव के पत्थर बनकर गुमनाम हो गए। उन्होंने जो तकलीफें सहन कीं उनका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। गुलाम मुल्क में रहना आैर गुलाम की जिंदगी जीना सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है, इसे सिर्फ वही लोग समझ सकते हैं जिन्होंने वह दौर देखा है।

आज मैं जिक्र कर रहा हूं 1947 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में हुर्इ एक घटना का। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 1947 में इंडियन इंडिपेंडेंस बिल पेश किया।

बिल पर खासी बहस हो रही थी। लोगों की अलग-अलग राय थी। तब विंस्टन चर्चिल ने कहा, अगर भारत को आजादी मिल जाएगी तो बदमाशों और मुफ्तखोरों के हाथ में शासन चला जाएगा।

वे नेता शासन की बहुत कम योग्यता वाले आैर तिनके की तरह बिखरे रहने वाले होंगे। उनकी जबान बहुत मीठी होगी (सुनहरे वादे करेंगे) लेकिन दिल में खोट होगा। किसी भी तरह से शासन पाने के लिए वे आपस में लड़ते-भिड़ते रहेंगे।

इस प्रकार भारत राजनीतिक गुटबंदी में खो जाएगा। आजाद भारत में पानी की बोतल हो या रोटी का टुकड़ा, कुछ भी टैक्स से नहीं बचेगा। बस हवा मुफ्त में मि…

स्वागत है!!

मेरे ब्लाॅग पर आपका स्वागत है। गांव का गुरुकुल एक आॅनलाइन लाइब्रेरी है। मैं इसे एक एेसे स्कूल के रूप में विकसित करना चाहता हूं जहां मोटी-मोटी उबाऊ किताबें आैर पीट-पीटकर पढ़ाने वाले मास्टर न हों। आप मेरे साथ फेसबुक पर भी जुड़ सकते हैं। इसके लिए यहां क्लिक कीजिए

मुझसे संपर्क करने के लिए यहां दायीं आेर दिया गया Contact Form भरकर भेजिए।

- राजीव शर्मा - 


शुक्र मनाइए र्इधी साहब कि हमने आप पर स्याही नहीं फेंकी

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भारत की बेटी गीता की वतन वापसी के बाद खुशी का माहौल है। इन सबके बीच मैं धन्यवाद कहना चाहूंगा र्इधी फाउंडेशन के श्री अब्दुल सत्तार र्इधी साहब को।

न सिर्फ इसलिए कि उन्होंने एक एेसी भारतीय बच्ची की परवरिश की जो बोल नहीं सकती आैर वे उसकी आवाज बने, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उसकी परवरिश में धर्म आैर मजहब जैसी बातों को कभी आड़े नहीं आने दिया।

आज दुनिया में नफरत बेचने का जो कारोबार चल रहा है, खासतौर से धर्म आैर राजनीति के गठजोड़ से फैलने वाला कट्टरपंथ, जो पाकिस्तान, भारत आैर बांग्लादेश में गहरी जड़ें जमा चुका है।

एेसे में र्इधी साहब ने गीता की जिस तरह से परवरिश की, उसके धर्म का सम्मान किया है, उसके लिए अलग कमरे में हिंदू विधि से पूजा की व्यवस्था तक की, मैं परमात्मा के इस नेक बंदे को सलाम करता हूं।

गीता उनके पास जितनी सुरक्षित थी उतनी तो अपनी मां की गोद में भी नहीं रही होगी। खबरों के अनुसार, र्इधी फाउंडेशन दुनिया की सबसे बड़ी एंबुलेंस सर्विस चलाता है। इसके अलावा कर्इ परोपकारी कार्यों के लिए र्इधी साहब को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वे बहुत विनम्र व्यक्ति हैं।

मुझे ताज्…

A News About Me In Hindustan Times

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A news about me in Hindustan Times... (26 oct.. 2015)


उर्दू अखबार में मेरे बारे में छपी खबर

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26 अक्टूबर 2015 को उर्दू अखबार Munsif Urdu Daily में प्रथम पृष्ठ पर मेरे बारे में एक खबर छपी है। आप भी पढ़िए।



र्इसा, तुम्हारे लिए तो मैं भी क्रूस पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाता

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मेरी कुछ सबसे पसंदीदा इमारतों में चर्च भी शामिल हैं। मुझे जब समय मिलता है तो मैं इंटरनेट पर दुनिया के बहुत पुराने चर्च की फोटो देखता हूं। वहां की बेंच और उन पर रखी बाइबिल की प्रतियां।

वहां बैठकर कितनों की प्रार्थनाएं परमेश्वर तक पहुंची होंगी, कितने ही शीश उसकी इबादत में झुके होंगे और कितनी ही उंगलियों ने पवित्र वचन पढ़ा होगा।

चर्च की खामोशी और उस खामोशी से पैदा होने वाली शांति, वहां परमेश्वर की स्तुति और प्रार्थनाओं की सामूहिक ध्वनि मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे नहीं लगता कि चर्च जैसी पवित्र जगह जाने के लिए किसी को अपनी पहचान या धार्मिक मान्यताओं का त्याग करना पड़ता है। आखिर हम हैं तो एक ही खुदा के बंदे।

न जाने कौनसा वह दिन रहा होगा जब हमने भगवान, पैगम्बरों और आसमानी किताबों का बंटवारा कर लिया। मैं हिंदू हूं लेकिन जब भी ईसा मसीह के बारे में पढ़ता हूं, उनके सामने श्रद्धा के साथ उतना ही नतमस्तक हो जाता हूं।

बाइबिल में ईसा मसीह का उल्लेख आता है लेकिन कुरआन में भी उनका कई बार जिक्र हुआ है और बहुत आदर के साथ हुआ है।

मुझे ईसा मसीह के जीवन की सभी बातों में से 3 बातें बहुत अच्छी लगती हैंः

1- उन्…

इस बच्ची की दुआआें से मुझे जीने की ताकत मिलती है

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मारवाड़ी परिवारों में जन्मदिन मनाने का चलन बहुत कम रहा है। अगर मनाते भी हैं तो परंपरागत तिथियों से। यहां अंग्रेजी कैलेंडर कोई काम नहीं आता।

अब कुछ सालों से लोग जन्मदिन मनाने लगे हैं और इस दिन की तस्वीरें संभाल कर रखने लगे हैं। मेरे पास ऐसी कोई तस्वीर नहीं है क्योंकि मैंने कभी उस तरह से अपना जन्मदिन नहीं मनाया जैसा कि लोग मनाते हैं।

... लेकिन इस दिन से जुड़ी एक चीज मैंने बहुत संभाल कर रखी है। पिछले जन्मदिन पर हमारे पड़ोस में रहने वाली एक बच्ची ने मुझे यह कार्ड भेंट किया था। वह पहली क्लास में पढ़ती है और चित्रकारी में उसकी बहुत दिलचस्पी है।

शुभकामनाओं का यह तोहफा मैं हमेशा मेरी डायरी में रखता हूं, क्योंकि इस बच्ची की दुआआें से मुझे जीने की ताकत मिलती है।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -