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Showing posts from October, 2015

वह ब्रिटेन जिसकी मैं तारीफ करता हूं

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मुझे वह ब्रिटेन पसंद नहीं जिसने भारत पर शासन के दौरान मेरे देशवासियों पर जुल्म ढाए, लेकिन मैं उस ब्रिटेन की तारीफ करता हूं जिसने दुनिया को लोकतंत्र, मानवाधिकार, कर्तव्य अौर समानता का पाठ पढ़ाया। वहां लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं।

ब्रिटेन दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा नहीं कर सकता लेकिन वह एक अच्छे लोकतंत्र के प्रति भरोसा मजबूत कर सकता है।

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा तो रोज करते हैं लेकिन यह सबसे अच्छा आैर सबसे मजबूत लोकतंत्र कब होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

इस तस्वीर में हैं- ब्रिटेन के पीएम श्री डेविड कैमरून... जो सफर के दौरान एक कोने में खड़े हैं आैर अखबार पढ़ रहे हैं। भारत में तो हम राजनेताआें से एेसे दृश्य की सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -


नानक बाबा कै नाम मारवाड़ी मं मांडेड़ी म्हारी अेक बात..

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मेरे पुरखों ने शहादत से पहले नहीं कहा कि मौत के बाद जनाजा मंदिर के नजदीक न गुजरे

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देश में एक अजीब-सी और जहरीली किस्म की हवा घुल रही है। कुछ लोग कहते हैं कि तुम गाय को हाथ तो लगाओ, हम तुम्हें छठी का दूध याद दिला देंगे तो कुछ लोग छाती ठोक कर ऐलान करते हैं- क्या समझते हो, हम तुम्हें गौमांस खाकर दिखाएंगे।

ये किस किस्म के लोग हैं और इनके कैसे इरादे हैं? आज हिंदुस्तान में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब बेटियों की अस्मत नहीं लूटी जाती, ऐसा कोई लम्हा नहीं बीतता जब कोई जिंदगी वक्त से पहले दम नहीं तोड़ती, किसान बदहाल है, अफसरों ने लूट मचा रखी है, लेकिन इन मुद्दों पर बात करने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। ये किस तरह की बहस लेकर हम बैठ गए हैं और क्यों एक दूसरे को चुनौती दे रहे हैं?

ऐसे हालात देखकर मुझे याद आते हैं वे लोग जिन्होंने 1857 में हिंदुस्तान पर काबिज गोरी हुकूमत की नींव हिला दी थी। कुछ ऐसा ही जमाना था, ऐसी ही घुटन थी, ऐसी ही तकलीफें थीं और ऐसी ही लूट थी लेकिन जब कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी की बात फैली तो वह बात सिर्फ बात नहीं रही, चिन्गारी बनकर इन्कलाब में तब्दील हो गई।

क्या थे वे लोग और कैसे थे उनके इरादे! उनका इन्कलाब किसी हिंदू या मुसलमान के लिए नहीं था। जब गाय…

ब्रिटेन की संसद में की गर्इ ये भविष्यवाणी आज सच हो गर्इ

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हमारे देशवासियों ने भारत की आजादी के लिए कर्इ कुर्बानियां दीं। कुछ नाम मशहूर हुए तो कर्इ इस आजादी की नींव के पत्थर बनकर गुमनाम हो गए। उन्होंने जो तकलीफें सहन कीं उनका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। गुलाम मुल्क में रहना आैर गुलाम की जिंदगी जीना सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है, इसे सिर्फ वही लोग समझ सकते हैं जिन्होंने वह दौर देखा है।

आज मैं जिक्र कर रहा हूं 1947 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में हुर्इ एक घटना का। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 1947 में इंडियन इंडिपेंडेंस बिल पेश किया।

बिल पर खासी बहस हो रही थी। लोगों की अलग-अलग राय थी। तब विंस्टन चर्चिल ने कहा, अगर भारत को आजादी मिल जाएगी तो बदमाशों और मुफ्तखोरों के हाथ में शासन चला जाएगा।

वे नेता शासन की बहुत कम योग्यता वाले आैर तिनके की तरह बिखरे रहने वाले होंगे। उनकी जबान बहुत मीठी होगी (सुनहरे वादे करेंगे) लेकिन दिल में खोट होगा। किसी भी तरह से शासन पाने के लिए वे आपस में लड़ते-भिड़ते रहेंगे।

इस प्रकार भारत राजनीतिक गुटबंदी में खो जाएगा। आजाद भारत में पानी की बोतल हो या रोटी का टुकड़ा, कुछ भी टैक्स से नहीं बचेगा। बस हवा मुफ्त में मि…

स्वागत है!!

मेरे ब्लाॅग पर आपका स्वागत है। गांव का गुरुकुल एक आॅनलाइन लाइब्रेरी है। मैं इसे एक एेसे स्कूल के रूप में विकसित करना चाहता हूं जहां मोटी-मोटी उबाऊ किताबें आैर पीट-पीटकर पढ़ाने वाले मास्टर न हों। आप मेरे साथ फेसबुक पर भी जुड़ सकते हैं। इसके लिए यहां क्लिक कीजिए

मुझसे संपर्क करने के लिए यहां दायीं आेर दिया गया Contact Form भरकर भेजिए।

- राजीव शर्मा - 


शुक्र मनाइए र्इधी साहब कि हमने आप पर स्याही नहीं फेंकी

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भारत की बेटी गीता की वतन वापसी के बाद खुशी का माहौल है। इन सबके बीच मैं धन्यवाद कहना चाहूंगा र्इधी फाउंडेशन के श्री अब्दुल सत्तार र्इधी साहब को।

न सिर्फ इसलिए कि उन्होंने एक एेसी भारतीय बच्ची की परवरिश की जो बोल नहीं सकती आैर वे उसकी आवाज बने, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उसकी परवरिश में धर्म आैर मजहब जैसी बातों को कभी आड़े नहीं आने दिया।

आज दुनिया में नफरत बेचने का जो कारोबार चल रहा है, खासतौर से धर्म आैर राजनीति के गठजोड़ से फैलने वाला कट्टरपंथ, जो पाकिस्तान, भारत आैर बांग्लादेश में गहरी जड़ें जमा चुका है।

एेसे में र्इधी साहब ने गीता की जिस तरह से परवरिश की, उसके धर्म का सम्मान किया है, उसके लिए अलग कमरे में हिंदू विधि से पूजा की व्यवस्था तक की, मैं परमात्मा के इस नेक बंदे को सलाम करता हूं।

गीता उनके पास जितनी सुरक्षित थी उतनी तो अपनी मां की गोद में भी नहीं रही होगी। खबरों के अनुसार, र्इधी फाउंडेशन दुनिया की सबसे बड़ी एंबुलेंस सर्विस चलाता है। इसके अलावा कर्इ परोपकारी कार्यों के लिए र्इधी साहब को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वे बहुत विनम्र व्यक्ति हैं।

मुझे ताज्…

A News About Me In Hindustan Times

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A news about me in Hindustan Times... (26 oct.. 2015)


उर्दू अखबार में मेरे बारे में छपी खबर

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26 अक्टूबर 2015 को उर्दू अखबार Munsif Urdu Daily में प्रथम पृष्ठ पर मेरे बारे में एक खबर छपी है। आप भी पढ़िए।



र्इसा, तुम्हारे लिए तो मैं भी क्रूस पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाता

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मेरी कुछ सबसे पसंदीदा इमारतों में चर्च भी शामिल हैं। मुझे जब समय मिलता है तो मैं इंटरनेट पर दुनिया के बहुत पुराने चर्च की फोटो देखता हूं। वहां की बेंच और उन पर रखी बाइबिल की प्रतियां।

वहां बैठकर कितनों की प्रार्थनाएं परमेश्वर तक पहुंची होंगी, कितने ही शीश उसकी इबादत में झुके होंगे और कितनी ही उंगलियों ने पवित्र वचन पढ़ा होगा।

चर्च की खामोशी और उस खामोशी से पैदा होने वाली शांति, वहां परमेश्वर की स्तुति और प्रार्थनाओं की सामूहिक ध्वनि मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे नहीं लगता कि चर्च जैसी पवित्र जगह जाने के लिए किसी को अपनी पहचान या धार्मिक मान्यताओं का त्याग करना पड़ता है। आखिर हम हैं तो एक ही खुदा के बंदे।

न जाने कौनसा वह दिन रहा होगा जब हमने भगवान, पैगम्बरों और आसमानी किताबों का बंटवारा कर लिया। मैं हिंदू हूं लेकिन जब भी ईसा मसीह के बारे में पढ़ता हूं, उनके सामने श्रद्धा के साथ उतना ही नतमस्तक हो जाता हूं।

बाइबिल में ईसा मसीह का उल्लेख आता है लेकिन कुरआन में भी उनका कई बार जिक्र हुआ है और बहुत आदर के साथ हुआ है।

मुझे ईसा मसीह के जीवन की सभी बातों में से 3 बातें बहुत अच्छी लगती हैंः

1- उन्…

इस बच्ची की दुआआें से मुझे जीने की ताकत मिलती है

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मारवाड़ी परिवारों में जन्मदिन मनाने का चलन बहुत कम रहा है। अगर मनाते भी हैं तो परंपरागत तिथियों से। यहां अंग्रेजी कैलेंडर कोई काम नहीं आता।

अब कुछ सालों से लोग जन्मदिन मनाने लगे हैं और इस दिन की तस्वीरें संभाल कर रखने लगे हैं। मेरे पास ऐसी कोई तस्वीर नहीं है क्योंकि मैंने कभी उस तरह से अपना जन्मदिन नहीं मनाया जैसा कि लोग मनाते हैं।

... लेकिन इस दिन से जुड़ी एक चीज मैंने बहुत संभाल कर रखी है। पिछले जन्मदिन पर हमारे पड़ोस में रहने वाली एक बच्ची ने मुझे यह कार्ड भेंट किया था। वह पहली क्लास में पढ़ती है और चित्रकारी में उसकी बहुत दिलचस्पी है।

शुभकामनाओं का यह तोहफा मैं हमेशा मेरी डायरी में रखता हूं, क्योंकि इस बच्ची की दुआआें से मुझे जीने की ताकत मिलती है।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -


अगर मुगल बादशाह लुटेरे थे तो मौत के बाद वे दौलत कहां ले गए?

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पाठक ध्यान दें, कोई टिप्पणी करने से पहले मेरे 3 सवाल जरूर पढ़ लें

कभी पढ़ा था और कई बार सुना था कि राजा-बादशाह कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी हुकूमत हमेशा के लिए नहीं होती। सनातन सत्ता सिर्फ परमात्मा की होती है। जिस सिकंदर के नाम से कभी दुनिया थर्राती थी आज उसका सिंहासन टूट कर धूल में मिल गया है।

महाराजा अशोक की वह तलवार जो रणभूमि में बिजली की तरह चमकती थी, आज कहां विलीन हो गई, कोई नहीं जानता। कभी मुगल बादशाहों के नाम का डंका पूरी दुनिया में बजता था लेकिन आखिरी शहंशाह बहादुर शाह जफर ने अपने घर से दूर आखिरी सांस ली और वे अपने वतन की मिट्टी के लिए भी तरसते रह गए।

इतिहास की कहानी बयान करने वाले ऐसे कई कागज हैं जिनकी स्याही वक्त के साथ मिट गई। कई कागज ऐसे भी हैं जिन पर नई कहानी लिखने के लिए स्याही तैयार हो रही है और उन्हें ज्यादा इंतजार नहीं करना होगा।

कल शाम को मैंने एक वेबसाइट पर ऐसे लोगों की कहानियां पढ़ीं जिनके पूर्वज राजा-महाराजा थे लेकिन अब वे बेहद मामूली जिंदगी गुजार रहे हैं। उनमें से एक परिवार का मैं आज जिक्र करना चाहूंगा।

इस परिवार का संबंध मुगल बादशाहों से है। सुल्ताना…

मेरे घर में है English Vinglish वाली एक 'श्रीदेवी', शायद आपके घर में भी हो!

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इस वक्त मेरे हाथ में एक बहुत पुरानी कॉपी है जिसमें एक बच्चे ने अपनी बेहद खराब हैंडराइटिंग में कुछ अक्षर लिखने की कोशिश की है। शायद उसे ‘क’ अक्षर लिखने में कोई परेशानी नहीं है लेकिन ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ उसे बहुत भयानक लगते थे।

अगर उसका बस चलता तो वह फौरन इन दोनों अक्षरों को वर्णमाला से बाहर निकाल देता। उसने कुछ पृष्ठों पर आम और सेब जैसे फलों के चित्र बनाने की कोशिश की है लेकिन इन्हें देखकर हंसी आती है क्योंकि ये किसी भी नजरिए से आम या सेब जैसे नहीं लगते।

यह एक ऐसे बच्चे की कॉपी है जिसने कुछ दिन पहले ही स्कूल जाना शुरू किया था। माफ कीजिए, वह बच्चा मैं हूं। तब मेरी मां गायत्री देवी मुझे हाथ पकड़कर उन अक्षरों को लिखना सिखाती थी जो मुझे बहुत कठिन लगते थे।

शायद अब मैं भी बड़ा हो गया हूं क्योंकि अब मां मुझसे कुछ नहीं लिखवाती। मुझे उसके हाथों की हल्की-फुल्की मार खाए भी कई वर्ष हो गए। इन वर्षों में उसकी तकनीकी योग्यता बस इतनी ही बढ़ी है कि जब मोबाइल पर किसी का फोन आता है तो वह बात कर सकती है।

उसे नंबर डायल करने की ज्यादा जानकारी नहीं है। और एसएमएस की तो बात ही छोड़ दीजिए। आज मैंने इनबॉक्स में 50 से…

उन लोगों के नाम जो दूसरे महायुद्घ में घायल हुए या मारे गए। यह बात मायने नहीं रखती कि उनके नेता युद्घ में जीते थे या हारे..

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दस बजकर दस मिनट

बहुत दिनों की लंबी नींद के बाद आज मेरी आंखें खुली हैं। मैं खुद को काफी तरोताजा महसूस कर रहा हूं, क्योंकि आज मैं पचास साल की नींद के बाद कोमा से बाहर आया हूं।

ये साल मैंने चीन के एक अस्पताल में बिस्तर पर गुजारे हैं। यह मेरी किस्मत से ज्यादा उन डॉक्टरों की मेहनत का नतीजा है, जिनकी वजह से मैं यह दुनिया फिर से देख सका हूं। मुझे ठीक तरह से याद नहीं कि पिछली बार मैं कब सोया था।

लेकिन इतना जानता हूं कि तब एक बड़ा धमाका हुआ था। उसके बाद कोई भारी चीज मुझसे टकराई और मैं तब से लगातार सोता रहा। यह 1940 के आस-पास का ही कोई साल था।

वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकता, क्योंकि उस रोज मेरा जन्मदिन भी था। मैं पूरे भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि सूरज अब भी पूर्व दिशा में उदय होता है या उसने भी अपना रास्ता बदल लिया, क्योंकि अब इस दुनिया में बहुत कुछ बदल चुका है।

मैं मेरे घर पहुंच गया हूं। अस्पताल का एक डॉक्टर मुझे गाड़ी से घर छोड़ने आया है। मेरे शहर के सरकारी अफसरों ने मुझे मदद का भरोसा दिलाया और एक आदमी भी कुछ महीनों तक मेरी देखभाल करने के लिए नियुक्त कर दिया है।

मेरा एक छोटा घर है, जिसके पीछे …

इस चेक की कीमत का अनुमान लगाना मेरे लिए संभव नहीं

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वैसे तो यह चेक सिर्फ 500 रुपए का है लेकिन मेरे लिए इसकी कीमत का अनुमान लगा पाना संभव नहीं है। यह 2014 में मुझे राजस्थान पत्रिका की परिवार मैग्जीन की आेर से मिला था। उसमें मेरी कहानी छपी थी - नर्इ सुबह का उजाला। वह मेरी पहली कहानी थी। कहानी का यह चेक मैंने बैंक में जमा नहीं कराया बल्कि आज भी संभालकर रखा है। मेरी वह कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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नई सुबह का उजालाः पढ़िए मेरी पहली कहानी

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नमस्कार साथियों, आज आपके लिए एक खास चीज लाया हूं। यह है मेरी एक कहानी, जिसका शीर्षक है- नर्इ सुबह का उजाला। 3 सितंबर 2014 को यह राजस्थान पत्रिका की परिवार मैग्जीन में छप चुकी है। एक एक सत्य घटना पर आधारित है। अब मैं विदा लेता हूं। आप पढ़िए ये कहानी-

नई सुबह का उजाला

वह चालीस के दशक का दूसरा साल था जब यूरोप से शुरू हुए महायुद्ध की आग सोवियत रूस तक आ पहुंची थी। यह एक बेहद ठंडे मौसम का दौर था जिसकी हवाओं में बारूद की अजीब तीखी गंध घुल चुकी थी।

अब लोग खुली हवाओं में सांस लेना भूल गए थे क्योंकि उनका ज्यादातर वक्त घरों के तहखानों में ही बीतता था। कल तक जो खेत और चारागाह हरे-भरे थे, आज वहां सिर्फ टैंक और बंकर ही दिखाई देते थे। सभी अस्पताल घायलों से भर चुके थे।

आज मास्को में भी काफी सर्दी थी। पूरी रात घना कोहरा छाया रहा जो सुबह भी कम नहीं हुआ। शायद इस शहर की भीड़ को इससे ज्यादा मतलब भी नहीं था। हर रोज सरहदी इलाकों से हजारों की तादाद में लोग यहां चले आ रहे थे।

उनके मुताबिक यही शहर दुनिया में सबसे ज्यादा महफूज है। शहर के एक व्यस्त चौराहे के पास बहुत बड़ा बगीचा था। उसी के एक कोने में चाय की छोटी द…

माफ करना, हम तुम्हें आंसुआें के अलावा आैर कुछ नहीं दे सकते

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कृपया धैर्य के साथ पढ़ें-

देश में सियासी शतरंज खेलने वाले बहुत शातिर होते हैं। सीधे रास्ते की हर टेढ़ी चाल इनके दिलो-दिमाग में छार्इ रहती है। हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते हैं आैर पांच साल में एक बार हम दिल्ली की सल्तनत चुनते हैं।

हर वक्त सभी पार्टियों के पास खुद के कौरव-पांडव और दूसरों को दिखाने के लिए आईने होते हैं। बड़े-बड़े दावे आैर वादे हमेशा किए जाते हैं जिन पर लोगों काे अब कोर्इ भरोसा नहीं रहा। इन्हीं में से एक है - आरक्षण।

यह कितनी सही है या कितना गलत- इसका फैसला आज मैं नहीं करूंगा। यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं। यहां आपको दो लोगाें की सत्यकथा सुना रहा हूं। इसे धैर्य के साथ पढ़िए ...

मेरे एक मित्र हैं जो ब्राह्मण परिवार से हैं। वे सीए हैं और इन दिनों एक नामी फर्म में काम कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले उनसे बात हुई तो पूछा, अब आगे क्या इरादा है?

वे बोले, भाई साहब, अपनी जन्मभूमि मां से बड़ी होती है, लेकिन क्या करें, अब तो इस मुल्क की व्यवस्था से नफरत हो गई है। नेताओं ने आरक्षण का ऐसा जहर घोला है कि हम चाहे कितनी भी आंखें फोड़कर पढ़ाई कर लें, हमारा भारत में कुछ नहीं हो सकता।

आखि…

इस पुलिसवाले की कहानी पढ़कर हमारे बेईमान पुलिसकर्मियों को कुछ शर्म तो आनी चाहिए

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चेतावनी- मेरा यह लेख सिर्फ बेईमान और बेरहम पुलिसकर्मियों की काले करतूताें पर आधारित है। कृपया ईमानदार और सत्यनिष्ठ पुलिसकर्मी इससे विचलित न हों। वे विवेक तथा संयम से इसे पढ़ें, क्योंकि यह उनके बारे में नहीं है।

यूपी पुलिस द्वारा एक बुजुर्ग टाइपिस्ट को पीटने और उसका टाइपराइटर तोड़ने की घटना को लोग भूले भी नहीं थे कि हमारी बहादुर पुलिस का एक और कारनामा सामने आ गया। इस बार एक राष्ट्रीय निशानेबाज दिव्यांशु के हाथ की अंगुलियां यूपी पुलिस के कांस्टेबल पदम सिंह ने तोड़ दीं। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह दारू के नशे में धुत्त कांस्टेबल को घूस के पैसे देना नहीं चाहता था।

ये लिंक चेक कीजिए- 

मुझे नहीं लगता कि इस जालिम पुलिसवाले का बाल भी बांका होगा। हां, खिलाड़ी का करियर लगभग खत्म ही समझिए। कृपया इस भ्रम में न रहें कि पुलिस की बेरहमी के रिकाॅर्ड सिर्फ यूपी में ही टूटते हैं। हमारे राजस्थान की पुलिस भी इससे कम नहीं है।

पिछले दिनों राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की छात्राएं मांग कर रही थीं कि उनके लिए शिक्षक की नियुक्ति की जाए ताकि वे पढ़ाई जारी रख सकें। इसके बदले उनके सिर पर लाठियां पड़ीं। कैसा इन्साफ है इ…

अब गुंडों से डर नहीं लगता मोदी जी, आप तो हमें पुलिस से बचा लीजिए...

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देश में पुलिस व्यवस्था उतनी ही जरूरी है जितनी सरहद के लिए फौज। फौज देश के दुश्मन से मुकाबला करती है और पुलिस का फर्ज होता है नागरिकाें का जीवन सुरक्षित बनाना। यह हमारी मालिक नहीं बल्कि सहयोगी होती है।

कुछ दिनों पहले इंटरनेट और मीडिया में एक फोटो खासी चर्चित रही। यूपी में एक पुलिसवाले ने किसी बुजुर्ग टाइपिस्ट के साथ मारपीट की और ठोकर मारकर उनका टाइपराइटर तोड़ दिया। जब इस मामले ने फेसबुक और मीडिया में जोर पकड़ा तो वह पुलिसकर्मी निलंबित किया गया और टाइपिस्ट को मुआवजा भी दिया गया।

सोचिए, अगर इस मामले ने इतना तूल नहीं पकड़ा होता तो क्या होता...? शायद वह पुलिसकर्मी अपनी गुंडागर्दी को जारी रखता। वह और ज्यादा बेखौफ होकर किसी और की रोजी-रोटी पर लात मारता।

भारत के प्रशासन में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां लोगों को किसी पद पर नियुक्त तो कर दिया जाता है लेकिन आम जनता से शालीन बर्ताव करने का तरीका नहीं सिखाया जाता।

आप किसी भी पुलिस स्टेशन, बैंक, पोस्ट आॅफिस या सरकारी दफ्तर में जाइए, बहुत कम कर्मचारी ऐसे मिलेंगे जो साधारण जनता से शालीन और विनम्र बर्ताव करते हैं। कई तो ऐसे होते हैं जो आम जनता को देखते…

हलीमा तुझे सलाम, यशोदा तुझे प्रणाम

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दुनिया के इतिहास में कितने महान लोग हुए हैं, उनकी तादाद का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। बड़ा आदमी बनने और इन्सानियत की हैसियत से बड़ा बनने में बहुत फर्क है।

उन बड़े लोगों का नाम और जिस्म खाक में मिल गया जिन्हें अपनी बड़ाई का बड़ा गुरूर था लेकिन वे लोग आज भी इस दुनिया के लिए चमकता सितारा हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी दूसरों की भलाई में बिता दी।

ऐसे लोग यकीनन बड़े हैं, अपने काम की बदौलत और उसके नतीजों को लेकर, लेकिन उन्हें बड़ा बनाने में एक और शख्सियत का हाथ होता है। वो हैं - उनकी मां का। इतिहास ऐसी माताओं को श्रद्धा से नमन करता है जिनके बच्चों के नाम से ये दुनिया रोशन हुई।

आज मैं दो माताओं की बात करूंगा जिनके बेटों का नाम दुनिया में अमर रहेगा। ये ऐसी मां हैं जिन्होंने उन बेटों को जन्म तो नहीं दिया था लेकिन दूध पिलाकर वे इतिहास में अमर हो गईं।

इनमें से एक हैं - हलीमा और दूसरी हैं - यशोदा। हलीमा ने पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) को दूध पिलाया था और यशोदा ने श्रीकृष्ण को। दोनों की किस्मत भी अनोखी थी और दोनों में ही कई समानताएं भी थीं।

जब भी श्रीकृष्ण का नाम आता है, उनकी मां के तौर पर यशोदा का जिक्र पह…

जब मैं बनूंगा संपादक तो ऐसा होगा मेरा अखबार

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मैं इस दुनिया के उन तमाम लोगों की तरह हूं जिन्हें सपने देखना पसंद है। मैं भी चाहता हूं कि मेरे वे सभी सपने पूरे हो जाएं जो मैं अक्सर खुली आंखों से देखता हूं। मुझे बंद आंखों से भी यही सपने दिखाई देते हैं।

कुछ सपनों को मैं डायरी में नोट कर लेता हूं ताकि उन्हें कभी भूलूं नहीं। मुझे मेरी याददाश्त पर पूरा भरोसा है लेकिन डायरी का कोई मुकाबला नहीं। यह हमें खुद से रूबरू होने का मौका देती है। मैं खुद को उस दिन के लिए तैयार रखता हूं जब मैं किसी अखबार का संपादक बनूंगा।

यह बात अभी महज सपना है लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि यह जरूर सच होगी, क्योंकि मेरे ज्यादातर सपने सच होते आए हैं। असल सवाल यह है कि जिस दिन मुझ पर किसी अखबार की जिम्मेदारी होगी तो वह दिन कैसा होगा?

यकीनन वह एक खास दिन होगा, जिसके लिए मेरे पास पूरी योजना है। खास इसलिए नहीं कि उसी दिन मैं बेहद साफ और कड़क इस्तरी किए कपड़े पहनने शुरू कर दूंगा या जब मैं फेसबुक पर मेरे एक अनजान दोस्त से गप्पे मारता रहूंगा तो बहुत व्यस्त होने का अभिनय करूंगा या मैं मेरे सेक्रेटरी से कह दूंगा कि आप किसी काम के लायक नहीं और बिल्कुल निकम्मे हैं। नहीं, यह दिन इ…

मैंने उसे सात साल दिए, वो मुझे पूरी जिंदगी दे गई

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अगर मुझसे पूछा जाए कि इस पूरी दुनिया में तुम्हें कौनसी जगह सबसे ज्यादा पसंद है, तो मेरे जवाब में लंदन और न्यूयाॅर्क नहीं होंगे। मैं इस दुनिया में सबसे ज्यादा मुहब्बत करता हूं मेरे गांव कोलसिया के राजकीय विद्यालय से। मेरा गांव कोलसिया जिला झुंझुनूं में है। इसी गांव के राजकीय विद्यालय में मैंने जिंदगी के सात साल बिताए।

वर्ष 2005 में मेरा एक्सीडेंट हो गया था। पेट में भयंकर चोट आई और मुझे जयपुर के एसएमएस हाॅस्पिटल में भर्ती करवाया गया। मेरी हालत बहुत खराब थी। जीवन क्या है? यह बात मुझे उस वक्त पता लगी।

मैंने एसएमएस के वार्ड नं. 3-एच में मौत को बिल्कुल करीब से देखा। मेरे वार्ड में अधिकतर ऐसे रोगी थे जिनकी स्थिति गंभीर थी। यह एक संयोग ही था कि मेरे बिस्तर के पास वाले रोगी तीन-चार दिनों के अंतराल में ईश्वर को प्यारे हो रहे थे।

एक लड़का जो मेरा बहुत अच्छा दोस्त बन गया था एक रात उसकी मौत हो गई थी। मैंने अपनी आंखों से उसे मरते देखा। मुझसे कुछ ही दूरी पर एक बुजुर्ग का बिस्तर था। वे बहुत बूढ़े हो चुके थे।

उनका एक बेटा अस्पताल में भी नमाज पढ़ता था। वे बहुत अच्छे लोग थे और उनके परिवार से अक्सर कोई मेर…

मेरी खेतड़ी यात्राः भाग-2

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पढ़िए, मेरी खेतड़ी-यात्रा का दूसरा भाग आैर जानिए कैसे एक नर्तकी से स्वामी विवेकानंद जी को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ....इस शृंखला की पहली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए

स्वामी विवेकानंदजी के जीवन में जितने अध्याय हैं, उन सबमें कोई गहरी सीख जरूर है। स्वामीजी की एक खासियत और थी, वे जितने बड़े ज्ञान के साधक थे, जमीन से भी उतने ही जुड़े हुए थे।

वे खेतड़ी के राजमहल में राजा अजीत सिंह के विशेष अतिथि बनकर रहे तो गुमनामी के दिनों में कई बार भूखे पेट भी रहे। लेकिन हर स्थिति में वे वही विवेकानंद थे जो सदैव अपने दिल में देश के दमित, शोषित और पीड़ित लोगों की पीड़ा को लेकर घूम रहा था।

जब मैं खेतड़ी स्थित स्वामी विवेकानंदजी के मंदिर में दर्शन करने गया तो वहां दीवार पर लगी एक पट्टिका पर लिखा हुआ था कि यही वह स्थान है जहां स्वामी जी को एक नर्तकी ने आत्मज्ञान कराया।

दरअसल एक बार जब स्वामीजी खेतड़ी आए तो शाम को वे राजा अजीत सिंहजी के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। यह स्वामीजी के अमेरिका जाने से पहले की घटना है।

तभी नर्तकियों का एक समूह वहां आया और उन्होंने राजाजी से निवेदन किया कि वे उनका गीत सुनें। मुख्…

मेरी खेतड़ी यात्राः भाग-1

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स्वामी विवेकानंद जी और राजस्थान का गहरा संबंध रहा है। बंगाल ने भारत को नरेंद्र दिया और राजस्थान ने विश्व को विवेकानंद। स्वामी विवेकानंद जी ने अलवर, सिरोही, अजमेर, जयपुर और खेतड़ी सहित अनेक स्थानों का भ्रमण किया था।

खासतौर से खेतड़ी का इतिहास स्वामीजी के जिक्र के बिना अधूरा है। एक बार मैं भी खेतड़ी गया था। मुझे तारीख याद है- 22 अप्रेल 2010...यहां स्वामी विवेकानंद जी स्मृति में एक मंदिर है।

बताया जाता है कि पहले यह राजा अजीत सिंह जी का महल था। आज यहां स्वामी जी की स्मृति में मंदिर तथा अन्य परोपकारी कार्य चलते हैं।

2010 में मैंने खेतड़ी आश्रम को एक पोस्टकार्ड लिखा था। जिसमें मैंने पूछा कि मैं स्वामीजी से जुड़े इस स्थान के दर्शन करना चाहता हूं। मुझे किस दिन आना चाहिए?

आश्रम ने मुझे सूचित किया कि किसी भी दिन आ जाइए। दो दिन बाद यानी 22 अप्रेल को मैं वहां गया। आश्रम के मुख्य स्वामी महाराज मुझसे स्नेहपूर्वक मिले।

महाराज पर पूरे आश्रम की गतिविधियों का दायित्व है लेकिन उन्होंने मुझसे विस्तार से बातें कीं और जीवन में सदैव लोककल्याण को लक्ष्य बनाने की बात कही।

उन्होंने मुझे स्नेहपूर्वक भोजन कराया और …

सल्तनत मिटती रहेंगी लेकिन इस राजा का नाम अमर रहेगा

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ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था, तब सबसे पहले विश्व-मंच पर भारत की आवाज बुलंद करने का श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है, तो वे शख्स स्वामी विवेकानंद हैं।

जब यूरोप और अमेरिका में भारत की छवि एक ऐसे देश की थी जहां माताएं अपने बच्चों को मगरमच्छों के सामने डाल देती हैं और हर गली में हाथी व सांप घूमते हैं, तब स्वामीजी ने उन्हें बताया कि वास्तव में भारत क्या है। उनके मुख से प्राचीन ग्रंथों की नई व्याख्या सुनकर वे चकित रह गए।

कल तक जो लोग स्वामीजी के पहनावे को देखकर उनका मजाक उड़ा रहे थे, आज वे उनका व्याख्यान सुनकर नतमस्तक थे। तब अमेरिका का कोई अखबार ऐसा नहीं था जिसके प्रथम पृष्ठ पर स्वामीजी की तस्वीर और उनका परिचय प्रकाशित न हुआ हो।

अक्सर लोग स्वामीजी के नाम और उनके काम से तो परिचित हैं, लेकिन एक ऐसी शख्सियत भी है जिसके बारे में वे बहुत कम जानते हैं।

ये महान शख्सियत हैं खेतड़ी के राजा अजीत सिंह। भारत के महान सपूत इस राजा का जीवन चरित्र भी बहुत महान है। स्वामीजी ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि राजा अजीत सिंह उनके सबसे प्रिय मित्र और शिष्य हैं। स्वामीजी की सफलता में अज…