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Showing posts from November, 2015

मैंने मुहब्बत तुमसे की है तो मौत से डरना कैसा

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जब से मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया है, मेरे कई दोस्त बन गए हैं। उनके साथ मेरा जुड़ाव सिर्फ इंटरनेट के जरिए है। मैंने उन्हें अब तक देखा नहीं, फिर भी उनसे दोस्ती का एक भावनापूर्ण रिश्ता बन गया है।

कुछ दिनों पहले मेरा ब्लाॅग पढ़ने के बाद मास्को में रहने वाले एक दोस्त को भरोसा हो गया कि मैं नास्तिक हो सकता हूं। यह उनका एक अनुमान था आैर जब मैंने उन्हें हकीकत बताई तो यह गलत निकला।

इस बात पर वे बेहद निराश भी हैं। उनका मानना है कि दुनिया में रहस्यों की संख्या बहुत ज्यादा है। जिस दिन दुनिया का आखिरी रहस्य सुलझा लिया जाएगा, उसी दिन हर गली-चौराहे पर नास्तिक लोगाें की संख्या ज्यादा दिखाई देगी।

उनके मुताबिक उस दिन का आगमन उतना ही निश्चित है जितना कि इस साल रूस में कड़क सर्दी पड़ना। मैं जानता हूं वह दिन इस धरती पर कभी नहीं आएगा जब दुनिया का आखिरी रहस्य सुलझा लिया जाएगा, लेकिन रहस्यों से जुड़ी उनकी विचारधारा जानने के बाद मैंने खुद से जुड़े रहस्यों पर गौर किया।

मैं मानता हूं कि हर शख्स की जिंदगी का एक भाग रहस्य के कोहरे में छुपा होता है। अक्सर ऐसे कई रहस्य हम भूल भी जाते हैं और जो याद रहते हैं उनका जिक्र…

पेरिस के लोगों, मुझे पूरी हमदर्दी है लेकिन मैं आपके समर्थन में अपनी Profile Pic का रंग नहीं बदलूंगा

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पेरिस हो या पंजाब, हमने धमाकों में सिर्फ बेगुनाह लोगों को मरते देखा है। बारूद का सौदा करने वाले कभी इस बात की परवाह नहीं किया करते कि इसके धमाके किसे बख्शेंगे आैर किसकी जान लेंगे, क्योंकि मौत के सौदागरों की जान सदा सलामत रहती है।

दो दशक पहले जब आतंकवादी गिरोह कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से निकाल रहे थे तब हिंदुस्तान बुलंद आवाज में दुनिया को बता रहा था कि इसे आतंकवाद कहते हैं ... लेकिन यूएन आैर अमरीका कहते कि यह तो दो देशों का छोटा-मोटा आपसी मसला है। इसलिए भारत को ज्यादा शोर नहीं मचाना चाहिए।

हमने 26/11 की कर्इ बरसियां मना लीं आैर हर बार दुनिया को बताते रहे कि इसे आतंकवाद कहते हैं लेकिन मुंबर्इ के वे धमाके इसकी गलियों में ही गुम हो गए, वे कभी यूरोप आैर अमरीका के कानों तक नहीं पहुंचे।

आज जो ISIS पेरिस तक पहुंच गया है, वह अमरीका की उसी नसीहत का नतीजा है जिसमें भारत को हर बार शांति बनाए रखने का संदेश मिलता आैर अातंकवाद फैलाने वाले देशों को अमरीकी डाॅलर।

मैं भी मानता हूं कि पेरिस के धमाके मानवता के विरुद्घ अपराध हैं आैर इसमें मरने वाले लोग बेकसूर हैं। जिन्हाेंने भी इस घटना को अंजाम दिया …

मेरा तुमसे कोर्इ रिश्ता नहीं, मगर मैं तुम्हें जिंदा देखने की दुआ मांगता हूं

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‘जमाना बड़ा खराब है’ - जमाने की शान में यह बात हम बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन यह अच्छा कब होगा, इसका पुख्ता जवाब शायद ही किसी के पास हो।

जमाना सौ फीसदी सही कब होगा, यह तो जमाना ही जाने, मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि अगर हम खुद की भूमिका पर गौर करें आैर उसमें सुधार कर लें तो भी जमाना बदल सकता है।

अक्सर ज़िंदगी के किसी मोड़ पर एक दौर ऐसा आता है जब हमें किसी की मदद की जरूरत होती है। साल 2005 की वह ठंडी रात आज भी मुझे याद है जब रात घर के बिस्तर पर गुजरी और अगला दिन ऑपरेशन थिएटर में।

दरअसल एक भयंकर दुर्घटना के बाद मुझे करीब एक महीना जयपुर के एसएमएस अस्पताल में बिताना पड़ा। उस दौरान ज़िंदगी की डोर कई बार कमजोर हुई, लेकिन किसी तरह यह टूटने से बची रही।

बीच में हालात कुछ ठीक हो जाने पर मैं घर चलने की जिद करने लगा। आखिरकार पिताजी मान गए और हमने दोपहर की ट्रेन से जाने का फैसला किया, क्योंकि उसमें भीड़ बहुत कम थी।

साथ ही सड़क पर लगने वाले झटकों से भी यह सुरक्षित थी। ट्रेन में मेरे सामने एक महिला बैठी थी। उसने मुझसे ज्यादा बात नहीं की, मगर हमारा सामान रखने में उसने बहुत मदद की।

अभी ट्रेन मुश्किल से एक घंट…

کاشی کے چندن میں مدینہ کی وہ خوشبو

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کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

وہ مٹھی بھر امیدیں
-وہ گہرے غم کے سائے

وہ چھتری دھوپ سنہری
-اور لمبی لمبی راہیں

لب پر نام ہو رب کا
-جب سفر ختم ہو جائے

تیری مٹی پاک مدینہ
-تیرا کن کن پاون کاشی

جنت کو میں کیا چاہوں
-بس نام تمہارا کہہ دوں

کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

محبت کے ہیں مرکز
-امن کا آشیانہ

گنگا تو ندی نہیں ہے
-تم سے رشتہ بہت پرانا

ہر ڈبکی میں تیری
-کائنات نظر جو آئے

میرے دل سے پوچھو تم بھی
-میری روح بسی ہے تجھ میں

میرے قدم چلیں نیکی پر
-ہمسایہ بن کر چل دوں

کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

ہو گئیں مرادیں پوری
-راہی کو ملا ٹھکانا

امیدیں جگیں نویلی
-عبادت کا ایک بہانہ

میرا ہر دن عید دیوالی

-ہر لمحہ خوشی لٹاو

مندر میں خدا ملے تو
-مسجد میں روز میں جاؤں

کاشی کے چندن میں ہے
-مدینہ کی وہ خوشبو

دنیا کی ہر رونق کو
-میں نام تمہارے کر دوں

دن بیتے شہر مدینہ
-اور سانجھ پڑی ہے کاشی

سچ ہو گیا خواب پرانا
-میرا دل خوش بھارت واسی

میری نظر جدھر بھی دی…

जब मुहम्मद साहब (सल्ल.) के इन्साफ से टल गया अरब की धरती से एक विनाश

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पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) एक एेसा नाम हैं जिनका असर सिर्फ अरब की धरती पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर हुअा। जिन लोगों ने सही नजरिए से उनके बारे में जानने की कोशिश की, उनके दिलों में पैगम्बर साहब (सल्ल.) का स्थान आैर भी ऊंचा हो गया लेकिन जिन्होंने किसी गलत जरिए या गलत नजरिए से उनके बारे में पढ़ा, सुना या समझा, उनके हाथ सिवाय नफरत के आैर कुछ नहीं लगा।

आज जिस इंटरनेट को हम ज्ञान का सबसे बड़ा आैर सहज माध्यम समझते हैं वहां अफवाहों का बाजार भी बहुत गर्म है। अगर आप लिखना जानते हैं तो एेसी बातें लिखिए जो लोगों में मुहब्बत आैर भार्इचारा पैदा करें।

इन्सान किससे बड़ा होता है? वह न तो किसी देवता का अश्लील चित्र बनाने से बड़ा होता है आैर न किसी पैगम्बर का कार्टून बनाने से। वह बड़ा होता है बड़े की बड़ार्इ करने से आैर उसकी खूबियों को अपनाने से। नफरत का जहर जितना जल्दी फैलता है वह उतनी ही तेजी से फैलाने वाले को खत्म भी करता है।

मेरी आज की यह पोस्ट पैगम्बर साहब (सल्ल.) के महान जीवन की एक घटना से जुड़ी है। मैं इस इरादे के साथ इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं कि नेक लोग हर देश आैर हर धर्म में पैदा हुए हैं।…

जब गुलाम बच्चे को पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने दी आजादी की सौगात

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गुलामी प्रथा का इतिहास बहुत पुराना है। दुनिया के अलग-अलग देशों में इसका जिक्र आता है। एक जमाना था जब लोग गुलाम रखते थे और उन्हें इस रिवाज में कोई बुराई नजर नहीं आती थी।

गुलाम भी इसे अपनी किस्मत का फैसला समझकर मंजूर कर लेते थे और इसी में उनकी जिंदगी खत्म हो जाती थी। कई देशों में लोग इसके समर्थन और विरोध में एकजुट हुए। वहां गृहयुद्ध तक हुए।

पैगंबर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने करीब डेढ़ हजार साल पहले ही कह दिया था कि ईश्वर के सामने सभी इंसान बराबर हैं। न किसी अरबी को गैर-अरबी पर प्राथमिकता है और न कोई गैर-अरबी किसी अरब वाले से बड़ा है।

उनके महान जीवन में ऐसी कई घटनाएं आती हैं जब उन्होंने गुलामों से न केवल बहुत अच्छा, बहुत नरमी का बर्ताव किया बल्कि उन्होंने गुलामों को आजाद तक कर दिया था। पढ़िए उनकी बेमिसाल जिंदगी की एक घटना जब उन्होंने एक गुलाम को आजाद कर दिया।

मुहम्मद साहब (सल्ल.) की पत्नी का नाम खदीजा (रजि.) था। खदीजा के एक भतीजे थे, नाम था- हुकैम-बिन-हिजाम। एक दिन खदीजा उनसे मिलने गईं तो एक गुलाम भी साथ ले आईं। वह एक लड़का था।

मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने उनसे पूछा- यह कैसा लड़का है खदीजा?

खदीजा (रज…
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सभी साथियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। आपके जीवन में प्रसन्नता, सफलता आैर प्रेम का प्रकाश हो। अनेक मंगल कामनाएं!!

- राजीव शर्मा -


क्या देखते हो लोगों, हर आंसू का हिसाब देना होगा

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क्या इन्सान को अपने गुनाह का बदला मिलता है? इस सवाल के बारे में अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि दुनिया में तो बुराई का ही बोलबाला है। अच्छे लोगों की कोर्इ नहीं सुनता और दुष्टों को लाख बुराई के बावजूद हमेशा तरक्की मिल जाती है।

हम लोग ऐसा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू बहुत कम लोग ही देख, सुन और समझ पाते हैं। अच्छाई एक दिन फल जरूर देती है, भले ही थोड़ा वक्त लग जाए। इसी तरह बुराई भी अपना असर जरूर दिखाती है। बस थोड़ा वक्त लग जाता है।

यह वक्त इसलिए लगता है क्योंकि परमात्मा या अल्लाह उस व्यक्ति को सुधरने के लिए थोड़ा समय देता है, लेकिन यकीन कीजिए भलाई और बुराई एक दिन जरूर अपना फल देती हैं।

मैं मेरी जिंदगी की एेसी कुछ घटनाआें का भी आगे जिक्र करूंगा जब मुझसे गलती हुर्इ आैर उसका विचित्र तरीके से फल भी मुझे मिला आैर बहुत जल्द मिला।

तब मैंने एेसा महसूस किया कि भलार्इ करने के बाद आप चाहें तो उसे भूल जाएं क्योंकि उसका नेक बदला मिलेगा आैर उससे हमें कोर्इ नुकसान नहीं है लेकिन बुरार्इ करने के बाद मुझे यह नहीं भूलना चाहिए कि हर लम्हा उसका बदला मेरी आेर बढ़ता जा…

तुम्हें कौनसी शक्ल दिखाऊं बापू, मेरे हाथ तो खून से रंगे हैं

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बापू के नाम यह खत मैंने 2 अक्टूबर 2013 को लिखा था। इसकी ज्यादातर बातें आज भी सच लगती हैं। खासतौर से खून से हाथ रंगे होने की। उस वक्त हमने मुजफ्फर नगर के दंगों में अपने हाथ रंगे थे आैर इस साल दादरी इलाक़े के बिसाहड़ा गांव में, जहां भीड़ ने सिर्फ अफवाह सुनकर अखलाक अहमद को मार डाला। इस बार मैं बापू को जन्मदिन की बधार्इ नहीं दूंगा क्योंकि हमारे हाथ खून से रंगे हैं।

प्यारे बापू,

सादर प्रणाम!

यह पत्र मैं तुम्हें धरती के उस हिस्से से लिख रहा हूं जिसकी आजादी के लिए तुमने पूरी जिंदगी दे दी थी। मुझे दुख है कि हम तुम्हें गोली के अलावा कुछ नहीं दे सके।

आगे समाचार यह है कि तुम्हारी गैर-मौजूदगी का हमने पूरा-पूरा फायदा उठाना सीख लिया है। जिस भारत की कहानी तुम अपने लहू की स्याही से लिख रहे थे, उसे हमने महाभारत बना दिया है।

हमने ताजा-ताजा खून से हाथ रंगे हैं। हमें आज हर इन्सान में ‘चोर’ दिखाई देता है, लेकिन हम खुद को सुधारने की कोई जरूरत नहीं समझते।

हक मांगने के मामले में हम बहुत जागरूक हो गए है और फर्ज की बातें हमें बिल्कुल पसंद नहीं। जिस राजनीति को तुम सेवा का सबसे बड़ा जरिया मानते थे, आज वह कुछ लोग…

सावधान रहें, क्योंकि कोर्इ आपकी कब्र पर चूल्हा जलाना चाहता है... होशियार रहें, कोर्इ आपकी चिता पर रोटी सेकना चाहता है

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इस कहानी को पढ़ने में जल्दबाजी न करें। यह भारत आैर अफगानिस्तान जैसे कुछ देशों पर आधारित है। इसमें मैंने यह बताने की कोशिश की है कि आज हम कुरआन आैर गीता के पैगाम को भूल गए हैं, इसलिए हमें अल्लाह या भगवान को दोषी ठहराने का कोर्इ हक नहीं है। दुनिया के बद से बदतर हालात के लिए इन्सान दोषी है आैर वह चाहे तो उन्हें बेहतर भी कर सकता है।

कुरआन आैर गीता में कहीं भी आतंकवाद का समर्थन नहीं किया गया है। ये दोनों किताबें शांति आैर भार्इचारे का संदेश देती हैं, लेकिन कुछ चालाक किस्म के लोग हमें बेवकूफ बनाते हैं आैर अपने खोटे मंसूबे पूरे करने के लिए इन पवित्र किताबें का हवाला देते हैं। हमें एेसे लोगों से बचना चाहिए। सावधान रहिए, क्योंकि कोर्इ आपकी कब्र पर चूल्हा जलाना चाहता है। होशियार रहिए, कोर्इ आपकी चिता पर रोटी सेंकना चाहता है। अब आप यह कहानी पढ़िए, मैं जाता हूं...

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- बेगुनाह का गोश्त -
यह मुल्क कौनसा है, मैं नहीं जानता। मेरा नाम भी मुझे मालूम नहीं। मेरा मजहब क्या है, यह मैं अब तक नहीं जान सका हूं। एक सवाल मैं खुद से बहुत बार पूछ चुका हूं कि यह साल…

ये अंधों का शहर है गुरुशरण, तुम चिराग बांटते क्यों मर गए?

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राजस्थान में पूर्णतः शराबबंदी की मांग को लेकर 32 दिनों से अनशन कर रहे पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा का देहांत हो गया। मुझे आश्चर्य होता है, इस जमाने में कोई शराबबंदी की मांग कैसे कर सकता है! यह तो आरक्षण, मंदिर-मस्जिद और गोश्त के नाम पर सियासत चमकाने का दौर है।

ऐसे में किसी ने शराबबंदी की मांग ही क्यों की? यकीनन ऐसे शख्स की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी और वह मेरे लिए, आपके लिए और सबके लिए भूख से मर गया।

मौत के बाद जहां परिजनों ने उनकी देह मेडिकल छात्रों के अध्ययन के लिए दान कर दी, वहीं यह मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई। सबसे बड़ा सवाल है- क्या भारत में कभी पूर्णतः शराबबंदी हो सकती है? इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन हकीकत यही है कि शराब ने कई घरों को उजाड़ा है, इसकी बोतल ने कई परिवार तबाह किए हैं।

मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिन्होंने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई शराब की दुकान में भेंट कर दी। उनके घर में चूल्हा भले ही न जले लेकिन बोतल का ढक्कन जरूर खुलता है। शराब को लेकर एक कहानी मैं भूला नहीं हूं जो मैंने कहीं पढ़ी थी। हो सकता है कि इसे पेश करने में कुछ कमी रह जाए। अगर रहे तो आप बताइए।