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Showing posts from December, 2015

घर क्या बंटा, बेटी अनजान बन गई। मुल्क क्या बंटा, उर्दू मुसलमान हो गई।

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बचपन से ही मेरी ख्वाहिश थी कि मैं एक ग्लोब खरीदूं लेकिन कभी खरीद नहीं पाया। इसकी वजह है मेरे गांव और उसके नजदीकी कस्बे की दुकानों में मुझे कहीं ग्लोब नहीं मिला। इसलिए मैंने दुनिया का नक्शा खरीद लिया और जब भी वक्त मिलता है इसे गौर से देखता हूं।

अगर बात नक्शे की करूं तो मैं पूरी दुनिया घूम चुका हूं लेकिन असल दुनिया में कभी दिल्ली जाने का भी मौका नहीं मिला। जब मैं नक्शे में किसी देश को देखता हूं तो उसका इतिहास और वहां की मुख्य भाषा का नाम मेरे दिलो-दिमाग पर छा जाता है।

जब मैं चीन को देखता हूं तो वहां की विशाल दीवार, ध्यान लगाते भिक्षु और तरक्की की बुलंदियां छूता एक प्राचीन देश पाता हूं। यहां की भाषा चीनी लोगों के स्वाभिमान को अभिव्यक्त करती है। दुनिया चाहे इसे कठिन मानती रहे लेकिन चीन इसी भाषा के दम पर लगातार आगे बढ़ रहा है।

भारत में संस्कृत ऐसी भाषा है जिसे मैं बहुत वैज्ञानिक तरीके से बनी हुई मानता हूं। हर अक्षर बहुत तार्किक और वैज्ञानिक ढंग से बना है। इसके लिए हमें प्राचीन त्रषियों का आभारी होना चाहिए। हिंदी को मैं खुले दिल की भाषा मानता हूं जिसने हर भाषा और संस्कृति का स्वागत किया है…

रब सब सुन रहा था, अगर मैं कुछ और मांग लेता तो मिल जाता

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कल शाम को घर जाते वक्त बस में बहुत भीड़ थी। मैं एक कोने में दुबका खड़ा था। साथ में किताबों का भारी थैला। इसलिए खड़े-खड़े पैरों में दर्द होने लगा।

मैंने मन में दुआ की ताकि यह दिक्कत दूर हो।

मैंने देखा, तुरंत मेरे लिए एक सीट खाली हो गई। मैं खुशी-खुशी उस पर बैठ गया।

तभी खयाल आया, इस वक्त रब ने मेरी दुआ कबूल कर ली। अगर मैं दुआ में सीट के बजाय कुछ और मांग लेता तो वह भी कबूल हो जाती।

- राजीव शर्मा, कोलसिया-

(मेरी डायरी से-25 दिसंबर 2011)

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वे सीमा पर जागते हैं तभी हम घरों में सुकून से सोते हैं

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अभी सर्दी की महज शुरुआत है और आज सुबह जब मैं ये अक्षर टाइप कर रहा हूं तो अंगुलियां कांप रही हैं।

ऐसे में हमारे बहादुर सैनिक सीमा पर मुस्तैदी से अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं, बिना शिकवा-शिकायत किए।

वे सीमा पर जागते हैं तभी हम घरों में सुकून से सो पाते हैं। उनके कष्ट का तो अंदाजा लगाना भी बहुत मुश्किल है। जो लोग बात-बात पर हड़ताल के झंडे उठा लेते हैं वे इस तस्वीर को जरा गौर से देखें।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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क्या स्वामी विवेकानंद जी को अपने अंतिम दिन का आभास था?

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क्या स्वामी विवेकानंद जी को अपने अंतिम दिन का आभास था? स्वामी जी ने 4 जुलाई 1902 को महासमाधि ली थी। उनका यह पत्र वर्ष 1900 में लिखा हुआ है यानी करीब 2 साल पहले। इसमें उन्होंने भगिनि निवेदिता को संकेत दिया है कि अब वे सिर्फ आराम करेंगे और शांत रहेंगे।

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युवाआें के नाम स्वामी विवेकानंद का पत्र

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अगर किताबें पढ़ने में आपकी रुचि है तो स्वामी विवेकानंदजी की एक किताब जरूर पढ़िए। इसका नाम है- अग्निमंत्र। इसमें स्वामीजी के कुछ एेतिहासिक पत्रों का संकलन किया है गया है जाे बहुत ही प्रेरणादायक हैं।

अग्निमंत्र मुझे बहुत अच्छी लगी। मैंने कर्इ बार इसे पढ़ा है आैर जब भी समय मिलता है, इस किताब को पढ़ता हूं। आज इसी किताब से आपके लिए स्वामीजी का एक पत्र प्रस्तुत कर रहा हूं।

यह पत्र उन्होंने 1893 में लिखा था। उस समय वे विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका जा रहे थे। वे भारत से जहाज में सवार हुए और जापान होते हुए अमेरिका गए।

पत्र से आप जान सकेंगे कि उस दौर की दुनिया कैसी थी, स्वामी ने क्या देखा और भारत के युवाओं के लिए उनका क्या संदेश था। पढ़िए स्वामीजी का यह पत्र...

ओरिएंटल होटल, याकोहामा,

10 जुलाई, 1893

प्रिय आलासिंगा, बालाजी, जि. जि. तथा मेरे मद्रासी मित्रगण,

अपने कार्यकलाप की सूचना तुम लोगों को बराबर न देते रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। यात्रा में जीवन बहुत व्यस्त रहता है और विशेषत: मुझे तो बहुत-सा सामान-असबाब साथ में लिये-लिये घूमने की आदत नहीं थी।

इन सब वस्तुओं की देखभाल में ह…

पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने कहा था कि जिस देश में रहो, उससे मुहब्बत करो

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हमने दुनिया का नक्शा बनते और बिगड़ते देखा है। ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब हिंदुस्तान के सीने पर भी परदेसी फौज के घोड़ों की टापें सुनार्इ देती थीं। हमने उन लोगों के किस्से भी किताबों में पढ़े हैं जिनकी तलवारें सिर्फ बेकसूर लोगों के खून से प्यास बुझाती थीं।

मैं इतिहास में सबकुछ जानने का दावा नहीं कर सकता लेकिन जितना जान सका हूं उसके आधार पर मुझे अतीत में दो महान घटनाएं ऐसी नजर आती हैं जब विजेता ने लाशों पर फतह नहीं पार्इ, अपनी जीत का जश्न नहीं मनाया और किसी कमजोर का गला नहीं दबाया। बल्कि युद्ध जीतकर भी उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया।

पहली घटना है- श्रीराम की लंका पर विजय। उस लंका पर जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सोने से बनी थी। तब श्रीराम के पास विशाल सेना थी, बहादुर साथी थे और हथियारों की भी कोर्इ कमी नहीं थी लेकिन उन्होंने जीती हुर्इ लंका विभीषण को सौंप दी।

वे चाहते तो लंका के राजा बन सकते थे। वहां आराम की जिंदगी गुजार सकते थे लेकिन उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि मुझे मां के कदमों की मिट्टी और मेरी मातृभूमि स्वर्ग से भी ज्यादा प्रिय हैं।

दूसरी घटना है पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) के जीव…

मंदिर का फूल और मस्जिद का पानी किसी में कभी फर्क नहीं करते

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जैसा मैंने देखा, जैसा मैंने समझाः

किसी एक धर्म के प्रति कट्टरता, किसी एक देश या जाति के लोगों को ही सबसे अच्छा या सबसे बुरा समझना सबसे बड़ी मूर्खता है। जहां कहीं जो अच्छाई है, उसकी कद्र करनी चाहिए।

सूली पर चढ़े यीशु और पत्थरों की मार से घायल हुए मुहम्मद साहब (सल्ल.) के खून का रंग उस वक्त भी वैसा ही था, जैसा आज आपके खून का रंग है।

मंदिर का फूल और मस्जिद का पानी किसी में कभी फर्क नहीं करते। एक बिना मजहब पूछे खुशबू फैलाता है, दूसरा वुजू के साथ हर इन्सान और परिंदे की प्यास बुझाता है।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

(From My Old Diary-- January 2011)
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आखिरी हज में पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने पूरी दुनिया के नाम दिया था यह पैगाम

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पैगंबर मुहम्मद साहब अल्लाह के जिस संदेश और इंसानों के लिए अच्छाई की सौगात लेकर आए उसमें उन्हें कामयाबी हासिल हुई।

यूं तो उनका संपूर्ण जीवन ही नेकी, भलाई, अमन और सच्चाई की मिसाल है, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी हज में जो बातें कहीं वे हर इंसान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

यह तब की बात है जब हिजरत का दसवां साल था। प्यारे नबी (सल्ल.) हज के लिए मक्का रवाना हुए। आपके साथ एक लाख से ज्यादा बहादुर साथियों का काफिला था।

इतिहास में इस हज को हिज्जतुल-वदा कहते हैं। यह आपका आखिरी हज था। इस हज को हिज्जतुल-बलाग़ भी कहा जाता है, क्योंकि अल्लाह का जो संदेश आप पहुंचाने आए थे, वह पूरा हो गया था।

इस अवसर पर आपने (सल्ल.) लोगों के सामने एक तकरीर भी की। आपने फरमाया-

प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कहूं, ध्यान से सुनो, क्योंकि हो सकता है कि इस साल के बाद मैं आपसे यहां न मिल सकूं।

याद रखो, मेरी बातों पर अमल करोगे तो फलत-फूलते रहोगे। इसके बाद आपने जिंदगी से जुड़ी कई पवित्र बातें कहीं। उनका सार इस प्रकार है-

अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत मजबूती से पकड़े रहना। लोगों की जान-माल और इज्जत का ख्याल रखना। कोई अ…