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Showing posts from January, 2016

मारवाड़ी में पढ़िए आचार्य महाप्रज्ञ जी के उपदेश

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आचार्य महाप्रज्ञ जी महान संत थे। उनका आविर्भाव झुंझुनूं के टमकोर नामक स्थान पर हुआ।

जब मैं स्कूल में पढ़ता था उन दिनों आचार्य जी के प्रवचनों पर आधारित एक शृंखला -' तत्व बोध' राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पृष्ठ पर छपती थी।

मैं उसका नियमित पाठक था। महाप्रज्ञ जी के प्रवचनों की विशेषता है - गंभीर से गंभीर विषय भी आपको बहुत सरल भाषा में मिलेगा।

पत्रिका में छपे उनके कर्इ आलेखों का मैंने संग्रह किया था आैर बाद में उनका मारवाड़ी में अनुवाद कर एक र्इबुक तैयार की जिसका नाम है - चिंतन को चौरायो।

इसमें आचार्य महाप्रज्ञ जी के उपदेशों में शामिल की गर्इं कुछ ज्ञानवर्द्घक कथाएं हैं। पढ़िए यह किताब..

- राजीव शर्मा -
गांव का गुरुकुल से

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श्रद्धेय कुलिश जी: लेखन के क्षेत्र में जिन्हें मैं आदर्श मानता हूं

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साथियो,

आज आपके लिए लाया हूं श्रद्धेय श्री कर्पूरचंद्र कुलिशजी पर मारवाड़ी में लिखी मेरी एक कविता। कुलिशजी का नाम ही उनका परिचय है। जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया था तब हिंदी पढऩा राजस्थान पत्रिका से सीखा था। उस समय कुलिशजी के विभिन्न लेख और पोलमपोल नाम से एक कविता रोज छपती थी (जो आज भी प्रकाशित होती है)। सुबह हॉकर अखबार डालकर जाता, तब मैं सबसे पहले पोलमपोल ही पढ़ता था। इसी से मुझे भविष्य में लिखने की प्रेरणा मिली।

वास्तव में कुलिशजी का संपूर्ण जीवन एक ऐसे नायक की कहानी है जिसे खुद की काबिलियत पर जितना भरोसा था, वैसा ही भरोसा उन्होंने उन लोगों में भी पैदा किया जो इस यात्रा में उनके साथी रहे। एक नायक और साधारण मनुष्य में यही फर्क होता है। नायक साधारण मनुष्य को भी धुन का धनी बना सकता है। पढि़ए, कुलिशजी को समर्पित यह कविता-

हर पानै मं मरूधर री पीड़ा,
हर आखर मं सिंह हुंकार।
ले सांच री लाकड़ी,
यो हर गोखा रो चौकीदार।

करके चेत चितार्यो गैलो,
जद सगळा चाल्या ईकै लार।
बखत पड़्यो जद बणगो पीथळ,
कदे करी ना यो उंवार।

हक री कलम सूं जग मं,
कर दियो ऊंचो नाम।
हर कूणै मं म्हारो साथी,
जैपर हो चाये जापान।

सात मार्च सन …

उड़ने से पहले कट गई काका की पतंग

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मकर संक्रांति मेरे पसंदीदा त्यौहारों में से एक है। इस दिन मैं नहाने की छुट्टी करता हूं और पूरा दिन छत पर बिताता हूं। तब मैं पूरे परिवार का पहला व्यक्ति होता हूं जो सबसे पहले दिन की शुरुआत करता है।

वह दिन ढेर सारे पतंगों और ‘वो काटा, वो मारा’ के शोर में बीतता है। इसके अलावा मैं मकर संक्रांति से जुड़े रहस्यों के बारे में बहुत कम जानता हूं। यह एक संयोग ही है कि मेरे जीवन में मकर संक्रांति से जुड़ी कई घटनाएं हैं जो इस दिन को और मजेदार बनाती हैं। साल 1997 की मकर संक्रांति इस मामले में अपवाद है, क्योंकि उस दिन मां ने मेरी पिटाई की थी।

इसके अलावा ज्यादातर संक्रांतियां बहुत अच्छी बीतीं। यहां मैं आपको इस दिन से जुड़ी कुछ खास घटनाएं बताने जा रहा हूं। जरा गौर से सुनिए...

लौटके ... घर को आए

मेरे एक काका हैं जिन्हें पतंगबाजी का बेहद शौक है। हर साल रामलीला, रावण दहन और फाग गाने में भी उनकी भूमिका सराहनीय होती है। एक बार काका ने प्रतिज्ञा की कि इस बार वे गांव में सबसे ज्यादा पतंग काटेंगे। इसके लिए उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से रणनीति बनाई।

शहर से महंगा धागा मंगवाया गया। रात को पुराने घर की ट्यूबलाइट फ…

नजर उठाकर देख ले हिंदुस्तान, तेरा कोई दोस्त नहीं है

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पठानकोट की गलियों से आती गोलियों की आवाज अब खामोश हो चुकी है। यहां की हवा सन्नाटे से भरी है और अखबार हमारे खून से। एक अजीब किस्म की बेचैनी है, एक खास तरह की उदासी है। आखिर मेरा हिंदुस्तान इतना उदास क्यों है?

हर साल दहशत के दुकानदार हमारे देश में नफरत का सौदा करते हैं। बेकसूर और मासूम लोगों को मौत के घाट उतारते हैं। हम दुश्मन को सबक सिखाने के दावे करते हैं, सरकार हमसे वायदे करती है और धीरे-धीरे हम सब भूल जाते हैं, क्योंकि हमें ऐसे ही किसी एक और धमाके का इंतजार होता है। आखिर हम इतने लाचार क्यों हैं?

धमाके तो पेरिस में भी हुए थे जिसका हमने और पूरी दुनिया ने मातम मनाया था। लोगों ने फ्रांस के पक्ष में अपनी फेसबुक फोटो का रंग बदला, मगर पठानकोट पर हमले के बाद सिर्फ हमारे देश में ही इसे लेकर गुस्सा है। दूसरे देशों ने तो सिर्फ अपने बयान दिए और आधी से ज्यादा दुनिया तो भूल गई होगी कि भारत में कहीं कोई हमला भी हुआ था। शायद धमाकों में मौत होना हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। दुनिया कहां तक हमारी फिक्र करेगी, क्योंकि इस देश के लोगों को एक दूसरे की फिक्र नहीं है।

पठानकोट के दर्द को सिर्फ हिंदुस्तान न…

मुझे चाहिए नए साल का यह तोहफा, दे सकते हैं तो दे दीजिए

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भाइयों-बहनों,

मैंने नए साल पर फेसबुक के जरिए आपसे एक चीज मांगी थी। (देखिए, इससे पिछली पोस्ट) मैं आपका दिल से शुक्रगुजार हूं कि आपने मेरी बात सुनी और बहुत गौर से सुनी।

मैं आपसे दौलत नहीं मांगूंगा मगर यह जानता हूं कि मांगता तो आप मना नहीं करते। मैं नेता नहीं हूं, इसलिए मुझे आपसे वोट भी नहीं चाहिए। मैं यह भी जानता हूं कि अगर आपसे कोई चीज मांगूंगा तो मिलने में ज्यादा देर नहीं होगी। बड़ी मेहरबानी, मगर इस वक्त मुझे ऐसी कोई चीज नहीं चाहिए।

नए साल में मैं आपसे इन चीजों का तोहफा मांगता हूं। अगर दे सकते हैं तो दे दीजिए।

1- इस साल सफाई पर खास ध्यान दें। कचरा न फैलाएं और इधर-उधर न थूकें। इससे कई बीमारियां पैदा होती हैं। अगर कोई दूसरा ऐसा करता है तो उसे मना करें। हर धर्म में सफाई को बहुत महत्व दिया गया है।

2- भूल जाइए उन लोगों को जो हमें धर्म और मजहब के नाम पर भड़काते हैं। ये लोग इसलिए ताकतवर हैं क्योंकि हम लोग कमजोर हैं। हमारी कमजोरी इनकी शक्ति है। ऐसे लोगों को महत्व देना बंद करें। ये लोग मुल्क के दुश्मन हैं। ज्यादा से ज्यादा एकता पैदा कीजिए।

3- यह देश मेरा है। यह देश आपका है। यह देश हम सबका है। इसी…