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मत बांटो मेरी दिल्ली को, मेरे घाव अभी तक गहरे हैं

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बहुत पहले से ही मेरा इरादा पूरी दुनिया घूमने का रहा है, मगर आज तक मैं दिल्ली भी नहीं देख सका। मेरा सफर गांव से शुरू हुआ और अभी जयपुर तक पहुंचा है। इससे आगे रास्ता कहां निकलेगा, रब ही जानता है, लेकिन दिल्ली आज भी उन शहरों की सूची में शामिल है जिन्हें मैं देखना चाहता हूं।

यही वो शहर है जिसकी गलियां पूरे हिंदुस्तान की किस्मत का फैसला करती आई हैं। एक जमाना था जब हमारी फौजें यहां से निकलतीं तो दुनिया के तख्त और ताज थर्राते, मगर वह भी एक जमाना था जब आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर ने नम आंखों से इस शहर को अलविदा कहा और यहां की मिट्टी तक के लिए तरस गए। शायद वो मिट्टी नसीब हो जाती तो उन्हें मौत कुछ सुकून से आती।

दिल्ली खुद में ही एक दुनिया है जिसकी मिट्टी में कई राज दफनाए गए हैं। आज इस शहर में कहीं दहशत का सन्नाटा है तो कहीं सन्नाटे की दहशत है। दिल्ली की फिजा अब बदली-बदली सी नजर आती है। न जाने दिल्ली को किसकी नजर लग गई?

कहने को तो यह हिंदुस्तान का दिल है और जो इस शहर में रहता है, यकीनन उसे बड़े दिलवाला होना चाहिए। आज इस शहर की कुछ गलियों से उन्हीं नारों का शोर है जिसने मेरे प्यारे वतन के सीने पर…